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कार्तिक पूर्णिमा यदि कृतिका नक्षत्र से युक्त हो तो परम पुण्यदायी मानी जाती है। इस वर्ष 28 नवम्बर दिन बुधवार को हृषीकेश पंचांग के अनुसार सूर्योदय 6.42 बजे और पूर्णिमा तिथि का मान 30 दंड 54 पला अर्थात सायंकाल 7.4 बजे तक और कृतिका नक्षत्र का मान 19 दंड 26 पला अर्थात दिन में 2.28 बजे तक है। इसलिए ‘व्रतराज’ के अनुसार यह स्नान-दान के विशिष्ट पर्व के रूप में मान्य रहेगा।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार इस दिन नदी की धारा में स्नान करने से सभी प्रकार के कायिक, वाचिक, मानसिक पापों का नाश हो जाता है। इस व्रत की विशेषता है कि इसमें किसी तरह का उपवास रखने की बाध्यता नहीं है। इस दिन उत्तरी भारत में काशी, प्रयाग, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, राजघाट, अनूप शहर, कानपुर, सोनपुर तथा बलिया और हरिहर क्षेत्र जहां श्रद्धालु पूरे कार्तिक मास स्नान करते हैं वहां मेला लगता है।
स्कंद पुराण के अनुसार इस दिन भगवान का मत्स्यावतार हुआ था। शिवपुराण के अनुसार इस तिथि को त्रैलोक्य को सताने वाले त्रिपुरासुर का विनाश भगवान शिव ने किया था। इन दोनों जनकल्याणकारी कार्यों की पुण्य स्मृति के रूप में इस तिथि को स्नान-दान की अत्यधिक महिमा बताई गई है।
इस दिन जो गौ, हाथी, घोड़ा, रथ, घृत आदि का दान करता है, उसे शिव पद प्राप्त होता है। ग्रह से पीड़ित व्यक्ति सुवर्ण या धातु मिश्रित मेष का दान करता है तो उसके समस्त ग्रहकृत दोष दूर हो जाते हैं। यदि कोई इस दिन व्रत रखकर जागरण पूर्वक संकीर्तन करता है तो उसे समस्त अभिष्टों की सिद्धि प्राप्त होती है। कार्तिक मास नदी की धारा में स्नान किया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है और विधि-विधान से शालिग्राम भगवान की पूजा की जाती है। सायंकाल देव मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाये जाते हैं। काशी में यह तिथि देव दीपावली के रूप में मनाई जाती है। चंद्रायण व्रत की समाप्ति भी इसी दिन होती है।

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