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कार्तिक पूर्णिमा 28 नवम्बर को है। यह पूर्णिमा संभावनाओं के द्वार खोलती है। वैसे हर पूर्णिमा मनुष्य को अपनी परम खिलावट के लिए प्रेरित करती है। पूर्णिमा का चांद पूर्ण होता है और रात भर अपनी गरिमा में मुस्कराता रहता है। यह प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अपनी किरणों के माध्यम से कुछ भेजता है। जो वह भेजता है, हो सकता है उसका असर एक-दो दिन में न हो, लेकिन होता है, यह पक्का है। पूर्णिमा के चांद द्वारा भेजा गया अदृश्य संदेश एक न एक दिन अपना रंग दिखाता है और मनुष्य पूर्ण होने के मार्ग पर अग्रसर होता है। कार्तिक पूर्णिमा भी ऐसा अवसर उपलब्ध कराने वाली एक पूर्णिमा है। यह मूल रूप से शीत के मौसम में पड़ती है। बल्कि कहा जाय तो यह संधिकाल होता है। बरसात जा रहा होता है और ठंड आ रही होती है। व्यक्ति की अंतर्यात्रा के लिए संधिकाल सबसे उत्तम समय है। नीचे संधिकाल और ऊपर अपनी परम खिलावट को प्राप्त चंद्रमा। साध्य का प्रतीक चंद्रमा आसमान में मुस्करा रहा है और उसको प्राप्त करने का मार्ग यह संधिकाल हमें चारो तरफ घेरे हुए है। एक तो मौसम का संधिकाल और दूसरे इस पर्व पर जो स्नान की महत्ता बताई गई है वह भी संधिकाल में अर्थात ब्रह्म मुहूर्त में। वहां रात व्यतीत हो रही है और दिन का आगमन होने वाला है। शीत में रात तीन बजे उठकर नदी घाट पर पहुंचने के लिए श्रद्धा चाहिए। इसीलिए श्रद्धालु ही पहुंच पाते हैं। वह श्रद्धा ही है जो मनुष्य को बड़ी सुगमता से पूर्णता के मार्ग पर ढकेल देती है। जहां श्रद्धा है वहां संघर्ष नहीं है। वहां भरोसा है और यह भरोसा बड़े काम का है। कार्तिक पूर्णिमा पर जो नदी की धारा में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का साहस कर लेते हैं, उनमें अंतर्यात्रा पर निकलने का साहस भी होता है। ऐसे समय में नदी की धारा में स्नान करना बिल्कुल ध्यान हो जाता है।
महर्षियों ने श्रद्धा व भरोसा बढ़ाने के लिए कुछ यांत्रिक उपाय भी बताए हैं। कार्तिक पूर्णिमा को वृष राशि पर चंद्रमा है। पुराणों के अनुसार आज के दिन बैल का दान करने व रात्रि व्रत करने से शिव लोक की प्राप्ति होती है। मनुष्य के अपनी परम खिलावट को प्राप्त होने का ही दूसरा नाम है- शिव लोक की प्राप्ति। शिव लोक की प्राप्ति में बैल दान व व्रत का यांत्रिक महत्व है। यह श्रद्धा पैदा करने का एक ढंग है। इसी तरह कार्तिक मास में ब्रह्म मुहूर्त में अपनी परम खिलावट को प्राप्त चंद्रमा के समक्ष नदी स्नान का महत्व भी है, यह ज्यादा समर्थ और सांकेतिक है। यह संकेत समझ में आ जाए तो कार्तिक पूर्णिमा के दिन नदी की धारा में स्नान विदा हो जाता है और अंतस का स्नान शुरू हो जाता है। अंतस का स्नान ही परम खिलावट का मार्ग है।
ज्योतिषाचार्य डॉ. धनेश मणि त्रिपाठी
अध्यक्ष सर्वे भवन्तु सुखिन:
तारामंडल, गोरखपुर

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