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नरक चतुर्थी व हनुमान जयंती 12 नवम्बर दिन शुक्रवार को है। इस दिन प्रात:काल जो स्नान कर यम के निमित्त पूजन व तर्पण करता है, वह मृत्यु के पश्चात नरक नहीं जाता है। आज के दिन अपामार्ग (चिचिहरा), तुम्बी (लौकी), चकवड़ व जायफल को स्नान के समय मस्तक पर घुमाना चाहिए। इससे भी नरक का भय समाप्त होता है। मस्तक पर घुमाते समय यह प्रार्थना करें- हे अपामार्ग मैं कांटे और पत्तों सहित तुम्हें बार-बार मस्तक पर घुमा रहा हूं, मेरे पाप हर लो। इसके बाद यमराज के नामों का तीन-तीन बार उच्चारण कर तर्पण करें। जिसके पिता जीवित हों उसे भी यह तर्पण करना चाहिए। वे नाम इस प्रकार हैं- यमाय नम:, धर्मराजाय नम:, मृत्यवे नम:, अंतकाय नम:, वैवस्ताय नम:, कालाय नम:, सर्वभूतक्षयाय नम:, औदुम्बराय नम:, दघ्नाय नम:, नीलाय नम:, परमेष्ठिने नम:, वृकोदराय नम:, चित्राय नम:, चित्रगुप्ताय नम:।
इस दिन देवताओं का पूजन कर दीपदान भी करना चाहिए। ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि के मंदिरों में, गुप्त गृहों में, रसोईघर, स्नानघर, देववृक्षों के नीचे, सभा भवन में, नदियों के किनारे, चहारदिवारी पर, बागीचे में, बावली के तट पर, कुओं पर, गली-कूचों में, अश्वशाला, गोशाला में भी दीपदान करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि जो मनुष्य इस दिन अरुणोदय के पश्चात स्नान करता है वह वर्ष भर के शुभ कार्यों का नाश करता है।
दीपदान त्रयोदशी से लेकर अमावस्या तक करना चाहिए। इसका कारण यह है कि वामन भगवान ने क्रमश: तीन दिनों में पृथ्वी नापने के पश्चात राजा बलि से वरदान मांगने को कहा था। उस समय बलि ने प्रार्थना की थी कि महाराज मुझको किसी वर की आकांक्षा नहीं है, परन्तु लोक कल्याण के लिए एक वर मांगता हूं- त्रयोदशी, चतुर्दशी व अमावस्या इन तीन दिनों में आपने मेरा राज्य नापा है, अत: जो मनुष्य चतुर्दशी के दिन यमराज के लिए दीपदान करे, उसे यम यातना नहीं होनी चाहिए। और इन तीन दिनों में जो दीपावली करे उसके घर को लक्ष्मीजी न छोड़ें। भगवान ने एवमस्तु कहा।
यह नरकासुर के वध का भी दिन है। भौमासुर नाम का असुर सोलह हजार कुमारियों व बहुत से राजाओं को बंदी बनाए था। वह पृथ्वी पर अनेक प्रकार के अत्याचार करता था। पृथ्वी उसके पाप से पीड़ित होकर भगवान के शरण में गई। यह भौमासुर नरकासुर के नाम से जाना जाता था। उसने अत्याचार कर पृथ्वी पर नरक का साम्राज्य स्थापित कर दिया था। पृथ्वी की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान श्रीकृष्ण ने उसके राज्य प्रागज्योतिषपुर पर आक्रमण कर कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को उसका वध किया था और सोलह हजार कुमारियों व राजाओं को मुक्त कराया था। कुमारियों ने भगवान को पति के रूप में वरण कर इस दिन दीपोत्सव का आयोजन किया था। इसी कारण इस दिन को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है।


हनुमान जयंती
नरक चतुर्दशी के दिन अर्धरात्रि में अंजना के गर्भ से हनुमानजी का जन्म हुआ था। इस दिन संकल्प पूर्वक हनुमान जी का सविधि पूजन करना चाहिए। इसके बाद बाल्मीक रामायण, सुन्दर काण्ड अथवा श्रीरामचरितमानस का पाठ करना चाहिए। रात में दीपावली मनानी चाहिए। कहा जाता है कि हनुमानजी अखंड ब्रह्मचारी हैं। अत: स्त्री वाचक पुष्प जैसे- रजनीगंधा, जुही, मालती आदि न चढ़ाकर केवल पुलिंग वाचक पुष्प ही अर्पित करना चाहिए। अगस्त्य संहिता के एक पद्य में लिखा है कि ‘उर्जे कृष्णचतुर्दश्यां भौमे स्वात्यां कपीश्वर:। मेष लग्नेऽञ्जना गर्भात प्रादुर्भूत: स्वयं शिव:’ इस दिन अंजना के गर्भ से शिव जी हनुमानजी के रूप में प्रगट हुए थे।


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  1. बहुत ही सुंदर जानकारी दी आपने । गांव में अब भी नरक निवारण चतुर्दशी का पर्व पूरी श्रद्धा से मनाया जाता है । शहरी परिवेश में लोग इससे परिचित नहीं हैं । अच्छी जानकारी के लिए आपका आभार
    जरूरी है दिल्ली में पटाखों का प्रदूषण

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