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संसार में श्रीगुरुनानक देव ऐसी आध्यात्मिक शख्सियत के रूप में प्रगट हुए हैं जिन्होंने मानवता की सर्व कठिनाइयों, अरुचियों, प्रवृत्तियों को प्रामाणिक उपदेश व सीध देकर उनके निजी, सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक जीवन को परिपक्व एवं शक्तिशाली बनाया है। उन्होंने समाज में सद्भावना, सौहार्द एवं भ्रातृत्व के भाव को उजागर करने पर प्रथम बल दिया। क्योंकि वे समझते थे कि जब तक मनुष्य में एकता के गुण नहीं होंगे, उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, निंदा, दुर्भावना का विनाश नहीं हो सकेगा। यही बुरी शक्तियां मनुष्य को ईश्वर व सन्माहर्ग से दूर करके पाप कर्मों का भोगी बनाती हैं। भाई गुरुदास जी ने गुरुजी की स्तुति करते हुए कहा है कि- सतगुरु नानक प्रगटिया मिटी धुंध जग चानण होवा। अर्थात गुरुनानक वह महान शख्सियत थे जिनके अवतार धारण करने मात्र से ही सारे दुष्कर्मों में भगदड़ मच गई। गुरुजी ने सतनाम का ऐसा चक्र चलाया जिसके प्रताप से मानववाद के पक्ष में सुखद हवा बहनी शुरू हो गई। अज्ञानता का अंधेरा चूर-चूर हो गया।
आज से 543 वर्ष पूर्व 1469 ई. में वैशाख सुदी तीन को पाकिस्तान स्थित राए भोए की तलवंडी में अपने नाना के घर प्रकाशमान हुए। सतगुरु नानकजी महाराज ने मनुष्यता के कल्याण के लिए वह सबकुछ किया जो एक दिव्य महापुरुष का फर्ज है। तात्कालिक दौर में यात्रा सुविधा नगण्य होने के बावजूद नानक ने अपने जीवन के 24 साल तक लगभग 39 हजार मील की पैदल यात्रा में समस्त भारत के अलावा नेपाल, भूटान, सिक्किम, चीन, मंगोलिया, रूस, तुर्की व इटली तक के दुर्गम स्थानों पर गए। इराक, इरान, कुवैत में जाकर लोगों को सत्य का संदेश दिया। श्रीलंका, वर्मा सहित तमाम अन्य देशों में भ्रमण कर अज्ञानता के जाल में फंसी भोली-भाली जनता को धर्म के सही अर्थ समझाए और उन्हें ईश्वर का नाम जपने, मेहनत करने एवं मिल बांटकर खाने का उपदेश दिया और एक ओंकार सतनाम का मंत्र जपाया।
बचपन से ही धैर्यवान, सहनशील व विचारवान थे गुरुजी।
नाना के घर के जन्म एवं बहन का नाम नानकी होने के कारण पिता मेहता कालू जी एवं माता त्रिपता ने नाम दिया नानक। जन्म होते समय ही उनके चेहरे पर ऐसा नूर था कि जिसने भी दर्शन किया वह सम्मोहित हो गया। सहसा आभास हो गया कि नानक कोई साधारण आत्मा नहीं हैं। कोई ईश्वरीय ज्योति हैं। बाल्यावस्था में दिव्य नानक के जब पढ़ने का समय आया तो उलटा अपने गुरुजी को ही आध्यात्मिक रहस्य का ज्ञान दे डाले। अंतत: गुरुजन नानक को नतमस्तम हो गए। उन्होंने संदेश दिया कि धरा पर कोई छोटा या बड़ा या ऊंच-नीच नहीं बल्कि सभी एक ईश्वर की समान संतान हैं। गुरुवाणी में दर्ज है-
अव्वल अल्लाह नूर उपाइया,कुदरत के सभ बंदे।
एक नूर ते सब जग उपज्या, को भले को मंदे।।
गुरु नानक एकेश्वरवादी थे। एक ईश्वर को छोड़ किसी दूसरे का स्मरण उचित नहीं समझते थे। वे कहते हैं कि-
दूजा काहे सिमरिए, जनमे ते मरि जाइ।
एको सिमरो नानका, जो जल थल रहिया समाय।।
नानक ने कभी जाति के भेद को स्वीकार नहीं किया। उनका मत था कि सभी एक ईश्वर की संतान हैं, फिर भेद कैसा। एक बार काजी के पूछने पर कि आप हिन्दू हैं कि मुसलमान, उन्होंने कहा कि-
हिन्दू कहो तो मारिए मुसलमान भी नाहिं, पांच तत्व का पुतला नानक मेरा नाम। उन्होंने मोह माया के भेद व बाहरी आडम्बरों को भी निरर्थक माना।
क्या क्या लिखें उस महान सतगुरु के बारे में शब्द और समय दोनों ही खत्म हो जाएंगे। बस उनके दिव्य चरणों में नतमस्तम होकर यही अर्ज है कि उनके उपदेशों का हम सभी सच्चाई से अनुसरण कर सकें और जगत के कल्याण में सहयोगी हों।



कुलदीप सिंह अरोरा
जनरल सेक्रेटरी
श्रीगुरु सिंह सभा गुरुद्वारा
जटाशकर, गोरखपुर

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