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लोगों को अक्‍सर ऐसा कहते हुए सुना जाता है कि नाम में क्या रखा है। पर कई बार नाम में ही कई दिलचस्प और अनोखी कहानियां छिपी होती हैं जो इतिहास बन जाती हैं। कुछ ऐसी ही दिलचस्प कहानी है गोरखपुर के तमाम महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक सूर्यकुण्ड धाम की। यह मंदिर जितना प्राचीन है, उतना ही खूबसूरत और कलात्मक भी है। यह महज जगह कुछ वर्षों पुरानी नहीं बल्कि युगों पुरानी है। इस मंदिर से जुड़ी तमाम कहानियों में से सबसे प्रमुख है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की और ऐसा कहा जाता है कि उस समय यह जगह उनके राज्य में आती थी। संस्कार भारती से जुड़े हरि प्रसाद सिंह कहते हैं कि एक बार अपने राज्य की सीमाओं के अवलोकन के समय भगवान श्रीराम गोरखपुर भी आए थे। उस समय यह शहर अवध और मिथिला को जोड़ता था और सूर्यकुंड दोनों राज्यों की सीमाओं को जोड़ता था। सूर्यकुंड क्षेत्र उस समय बेहद खूबसूरत हुआ करता था और यहां पर एक प्राकृतिक जलाशय भी था। इसकी रमणीयता से आकर्षित होकर श्रीराम ने उस जगह पर आराम किया। पोखरे में स्नान किया और वहीं पर भुवन भाष्कर का पिंड बनाकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करने के बाद सूर्य की आराधना की। बाद में इस जगह पर भगवान सूर्य के अलावा अन्य देवी देवताओं के भी मंदिर बने जो कुंड के मुख्य द्वार पर स्थित हैं। चूंकि भगवान श्रीराम ने यहां पर सूर्य की उपासना की थी इसलिए इस जगह का नाम सूर्यकुंड धाम पड़ा। सूर्य मंदिर के अलावा पोखरे के मध्य में लक्ष्मी-नारायण का एक मंदिर भी है और ऐसे मंदिर अब कम ही दिखते हैं। वक्त के साथ इस पोखरे की महत्ता बढ़ती ही गई है। धर्म-कर्म, छोटे-मोटे रीति-रिवाज और रस्मों के अलावा अब यहां पर हर साल छठ के मौके पर हजारों की संख्यां में महिलाएं उगते और डूबते सूर्य को अर्ध्य देती हैं। यानि कि त्रेता युग से लेकर कलयुग तक इस जगह पर सूर्य की उपासना होती आई है और शायद यह युगों-युगों तक होगी।
सूर्यकुण्ड त्रेता ही नहीं बल्कि द्वापर युग की ऐतिहासिक घटनाओं का भी गवाह रहा है। कहा जाता है अज्ञातवास के दौरान इसी क्षेत्र में गोपालक के रूप में पाण्डवों ने महाराज विराट की गायों की रक्षा की थी, इसीलिए इस शहर का नाम गोरक्षपुर पड़ा। हरि प्रसाद सिहं आगे कहते हैं कि अपनी सुंदरता और नदी के किनारे होने के कारण यह जगह ऋषि-मुनियों की तप स्थली भी रही है। इतना ही नहीं, बुजुर्गों की बातों पर यकीन करें तो विधर्मीं आक्रमणकारियों से अपने सतीत्व की रक्षा करने के लिए इसी पवित्र क्षेत्र में महिलाएं आत्मदाह कर सती हो जाया करती थीं। सूर्यकुंड परिसर और उसके आस-पास बने असंख्य प्राचीन सती स्थल इस बात को साबित करते हैं, जिनमें से कई तो सैकड़ों वर्ष पुराने लगते हैं। ऐसा लगता है कि रोहिन नदी के सूर्यकुंड के बगल से होकर बहने के नाते भी महिलाओं ने सती होने के लिए इस जगह को चुना था। रोहिन नदी अवध और मिथिला राज का प्राकृतिक निर्धारण करती थी। इन सब के अलावा इस जगह के बारे में यह भी कहा जाता है कि मध्य काल में राजा मान सिंह ने सूर्यकुंड की पौराणिकता से प्रभावित होकर उस क्षेत्र में प्रसिद्ध मानसरोवर पोखरा, अपनी रानी के लिए शीशमहल और रानी का गोला का निर्माण कराया था। जबकि अपनी दूसरी पत्नी कौलापति रानी के लिए उन्होंने शानदार जलाशय बनवाया था जो अब कौलदह के रूप में जाना जाता है। कुछ वर्षों पहले उस कौलदह को पाटकर सूर्यविहार कॉलोनी बना दी गई। राजा मान सिंह की रानियां सूर्यकुण्ड मंदिर पर पूजा-अर्चना के लिए आया करती थीं। जानकारों का कहना है कि शीश महल से मानसरोवर और मानसरोवर से सूर्यकुण्ड तक सुरंगे बनी थीं, जो धीरे-धीरे विलुप्त होती गईं
सूर्यकुण्ड के बारे में यह भी कहा जाता है कि प्राचीन समय में यही क्षेत्र गोरकपुर का पश्चिम प्रवेश द्वार भी था। पाली के शासकों ने यहां पर धर्मशालाओं और ठाकुरद्वारों का निर्माण कराया था। उनमें से एक ठाकुरद्वारा आज भी है। सूर्यकुण्ड क्षेत्र में शिव मंदिरों का भी निर्माण हुआ था। इसमें से एक शिव मंदिर की केवल नींव बची है, जिसे देखकर लगता है कि यह मंदिर काफी प्राचीन रहा होगा। दूसरा अतिप्राचीन शिवमंदिर भी है जहां खासतौर से शिवरात्रि के मौके पर पूजा-अर्चना के लिए भक्तों का जमावड़ा लगता है। इसके साथ ही इसी क्षेत्र में तपस्वियों की साधना स्थली भुइंधरी के रूप में विद्यमान है। 1940 में साधु श्री मुनेश्वर दास ने सूर्यकुंड के पोखरे को एक नया स्वरूप दिया, जिसमें उसकी सीढ़ियां पक्की कराईं गईं और उसके चारो किनारों पर मंदिर बनवाया गया। बस विडंबना यह रही कि सूर्यकुण्ड पोखरे का प्राकृतिक भूमिगत जल श्रोत बंद कर दिया गया, जिसके कारण यह कुंड कहलाया था। इतिहास की इतनी सारी कहानियों को अपने आप में समेटे हुए सूर्यकुंड को ऐसे ही धाम नहीं कहा जाता है। प्राचीन सूर्यमंदिर और पोखरे के बीच में स्थित लक्ष्मी-नारायण मंदिर के अलावा उससे कुछ ही दूरी पर एक प्राचीन शक्ति मंदिर भी स्थित है। इस मंदिर के बारे में वहां के पुजारी का कहना है कि जिस समय सूर्यकुंड एक घना जंगल हुआ करता था, उस समय अपने आप ही खिरनी के पेड़ के नीचे से देवी की मूर्ति निकली थी। वहां यदा-कदा आने-जाने वाले लोगों की इसपर नजर पड़ी और वे इसे पूजने लगे। उस मंदिर में देवी के सामने मांगी हुई हर मन्नत पूरी होने लगी और धीरे-धीरे उसकी मान्यता बढ़ने लगी, लोग दूर-दूर से वहां देवी के दर्शन के लिए आने लगे। इस जगह पर करीब 30-35 वर्ष पहले देवी मां एक भव्य मंदिर बनवाया गया। मंदिर परिसर में उस खिरनी के पेड़ के नीचे आज भी वह छोटा सा मंदिर स्थित है। हर नवरात्र यहां पर भक्तों का हुजूम उमड़ पड़ता हैा

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