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प्रबोधिनी एकादशी 24 नवम्बर को है। इस दिन भगवान विष्णु से तुलसी जी के विवाह की प्रथा है। कार्तिक शुक्ल नवमी से एकादशी तक निराहर व्रत रखा जाता है। चाहें तो एक दिन एकादशी के दिन व्रत रखकर भी इसका आयोजन कर सकते हैं।
ज्योेतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार एकादशी के दिन तुलसी जी के पौधे का गमला गेरू आदि से सजाकर चारो ओर ईख का मंडप बनाकर तुलसीजी को सुहाग की चुनरी ओढ़ा दिया जाय और चूड़ी पहनाकर उनका दुल्हन की भ।ति श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद गणपति आदि देवताओं एवं भगवान के श्रीविग्रह शालिग्राम का पूजन कर तुलसीजी का ‘तुलस्यै नम:’ मंत्रोच्चार के साथ षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इसके बाद दक्षिणा के साथ एक नारियल टीका के रूप में रखकर भगवान के श्रीविग्रह शालिग्राम का सिंहासन उठाकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराते हैं और आरती कर विवाह संपन्न करते हैं। दूसरे दिन द्वादशी को श्रद्धानुसार ब्राह्मण दंपत्तियों को भ•ोजन कराकर दान-दक्षिणा दी जाती है।
भगवान क्यों बने शालिग्राम शिला
तुलसीजी का जन्म दक्षसावर्णि मनु के वंशज धर्मध्वज के यहां कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। स्कंद पुराण के अनुसार उस जन्म में उनका विवाह दैत्यराज शंखचूड़ के साथ हुआ। शंखचूड़ पूर्व काल में श्रीकृष्ण का ही अंश सुदामा नामक गोप था जो राधिकाजी के शाप के कारण शंखचूड़ के रूप में उत्पन्न हुआ था। श्रीकृष्ण का ही अंश शंखचूड़ प्रतापी व दानी राजा था। उसकी अधीनता तीनों लोकों ने स्वीकार कर ली थी। देवता राजपाट छिनने से दु:खी थे। उन्होंने श्रीहरि से प्रार्थना की। उस समय श्रीहरि विष्णु ने बताया कि शंखचूड़ मेरा ही अंश है इसलिए अपराजेय है। इसके बाद श्रीहरि शिव को अपना त्रिशूल देकर शंखचूड़ का वध करने का दायित्व सौंपा और कहा कि मैं ब्राह्मण वेश में जाकर शंखचूड़ से उसका कवच दान के रूप में प्राप्त कर लूंगा, फिर आप उसका वध कर दीजिएगा। इस प्रकार शिव ने शंखचूड का वध किया। इसके बाद भगवान विष्णु शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के पास गए। सती तुलसी को उनके छल का पता चल गया और उन्होंने श्रीहरि को पाषाण बनने का शाप दे दिया। फिर श्रीहरि की इच्छानुसार तुलसी दिव्य देह में श्रीहरि की पत्नी के रूप में उनके साथ चली गई और भगवान के वक्षस्थल पर लक्ष्मी के समान ही शोभा पाने लगी। उस समय भगवान ने तुलसी को कहा था कि तुम्हारा शाप सत्य होगा और मैं पाषाण बनूंगा। तब मेरा निवास गण्डकी नदी के किनारे होगा। गण्डकी नदी तुम्हारे ही देह से उत्पन्न होगी। कालान्तर में ऐसा ही हुआ। श्रीहरि ने शालिग्राम के रूप में तुलसी से विवाह किया। उसी उपलक्ष्य में आज भी तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है।

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