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बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे। जीवन से दु:ख का निवारण करने के लिए उन्होंने घर का त्याग किया। कठोर तपस्या करने के बाद उन्हें बोध गया में ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनके अनुयायी बौद्ध कहलाए। कालांतर में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ। बौद्ध धर्म को अनीश्वरवादी कहा गया है। यह धर्म ईश्वर के अतित्व में विश्वास नहीं करता। इस धर्म के अनुसार जीव को बिना कर्म किए मोक्ष प्राप्त करना संभव नहीं है। बौद्ध धर्म जाति-पांत का घोर विरोधी है। यह धर्म मानव समानता का पक्षपोषण करता है। बौद्ध धर्म के अनुसार जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त कर सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाना है। मोक्ष या निर्वाण प्राप्ति के लिए भगवान बुद्ध ने चार मार्ग बताए जिसे चार आर्य सत्य कहा जाता है- संसार दु:ख से भरा है। इस दु:ख का कारण है। दु:ख का कारण मनुष्य की तृष्णा है। तृष्णा को नष्ट कर दु:ख का निवारण किया जा सकता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए गौतम बुद्ध ने जो मार्ग बताया उसे अष्टांगिक मार्ग कहते हैं। अष्टांगिक मार्ग के अंतर्गत सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, समयक वाक्, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक ध्यान व सम्यक समाधि है।
बौद्ध धर्म की महासंगीतियां-
प्रथम बौद्ध संगीति- 483 ई.पू. में अजातशत्रु के समय हुई।
द्वितीय बौद्ध संगीति- 383 ई.पू. में कालाशोक के समय हुई।
तृतीय बौद्ध संगीति- 251 ई.पू. में सम्राट अशोक के समय हुई।
चतुर्थ बौद्ध संगीति- प्रथम शताब्दी में कनिष्क के समय हुई।
संप्रदाय- बौद्ध सिद्धान्तों को लेकर बौद्ध अनुयायियों में मतभेद हुआ और कनिष्क के समय यह धर्म दो संप्रदायों में विभक्त हो गया- हीनयान तथा महायान। बौद्ध धर्म के आदर्शों को यथावत स्वीकार करने वाले हीनयानी तथा समय के अनुसार उन सिद्धान्तों में परिवर्तन कर उन्हें अपनाने वाले महायानी कहलाए। हीनयान का अर्थ निम्न तथा महायान का अर्थ उत्कृष्ट था। महायान समव्यापक व सर्वसाधारण के लिए सुलभ था। इन दोनों संप्रदायों में मूलभूत अंतर इस प्रकार थे-
1-हीनयान बौद्ध धर्म का मूल था, महायान नवीन स्वरूप। 2- हीनयान के अनुसार मनुष्य को निर्वाण प्राप्ति के लिए स्वयं प्रयास करना चाहिए, ईश्वर व देवताओं से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। महायान ने बुद्ध को ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित किया। हीनयानी महात्मा बुद्ध को महापुरुष मानते थे। 3- हीनयानी बुद्धत्व प्राप्ति के लिए भिक्षु बनने एवं संसार त्यागने पर बल देते हैं, महायानी नहीं। 4- महायान परोपकार पर बल देता है जबकि हीनयानी व्यक्तिवादी धर्म है जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयत्नों से निर्वाण प्राप्त करना चाहिए। महायान समस्त मानव जीवन के कल्याण की बात करता है। 5- महायान आत्मा, पुनर्जन्म तथा तीर्थों में विश्वास में करता है। हीनयानी मूर्ति पूजा व भक्ति में विश्वास नहीं करते। 6- हीनयानी साधना की कठोर पद्धति अपनाने पर बल देते हैं। महायानी साधारण उपायों पर बल देते हैं।

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  1. प्रभावी लेखन,
    जारी रहें,
    बधाई !!

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  2. नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

    ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...

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  3. http://vishwavijetanovel.blogspot.in/

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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