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विलक्षण स्वरूप में स्थित सिद्ध प्रभु दत्तात्रेय के जन्म और नामकरण की कथा भी विलक्षण है। उनका जन्म मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को प्रदोष काल में हुआ था। ये महर्षि अत्रि व सती अनुसूया की संतान हैं। महर्षि अत्रि के पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कठोर तप करने पर भगवान विष्णु ने इन्हें ‘दत्तो मयाहमिति यद् भगवान स दत:’ इस प्रकार कहा अर्थात मैंने स्वयं को तुम्हें दे दिया है। इस प्रकार उक्त वचनों से दत्त एवं महर्षि अत्रि पुत्र होने के कारण ‘आत्रेय’ ग्रहण करने से इनका नाम दत्तात्रेय पड़ा।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र ने कहा कि इनके जन्म के पीछे एक और कथा है। एक समय की बात है कि ब्रह्मा, विष्णु व महेश आदि देवों की अर्धांगिनयों को अपने सतीत्व पर अहंकार हो गया। उन्हें लगा कि हमारे समान पातिव्रत्य धर्म का पालने करने वाली तो इस संसार में कोई स्त्री नहीं है। जब त्रिदेवों को यह पता चला तो वे चिंतित हो उठे। उन्हें भक्तों का अहंकारग्रस्त होना पसंद नहीं है। उन्होंने तीनों देवियों का अहंकार दूर करने के लिए संदेशवाहक के रूप में नारदजी को चुना। नारदजी तीनों देवियों के सम्मुख जाकर कहे कि सती अनुसूया का सतीत्व सूर्य के तेज से भी अधिक है और उनके समान सती त्रिभुवन में कोई नहीं है। यह सुनकर तीनों देवियां क्रोध से भर उठीं और कहने लगीं कि उनका सतीत्व हम लोगों के सामने कुछ भी नहीं है। नारदजी ने कहा ठीक है देवियों, अगर आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो आप उनकी परीक्षा लेकर देख सकती हैं। अब तीनों देवियां सती अनुसूया की परीक्षा लेने के उद्देश्य से अपने पतियों के पास पहुंचीं और सारा वृतान्त कह सुनाया। त्रिदेव तो यही चाहते थे, वे अपनी पत्नियों के कहे अनुसार सती अनुसूया की परीक्षा लेने पहुंच गए। तीनों ने साधु का वेश बनाया और भिक्षां देहि की आवाज सती अनुसूया के दरवाजे पर लगाने लगे। जब अनुसूया भिक्षा लेकर आर्इं तो वे भिक्षा लेने से मना कर दिए और हे देवि! हम ऐसी भिक्षा नहीं लेंगे। यदि तुम निर्वस्त्र होकर भिक्षा दो तभी हम भिक्षा ग्रहण करेंगे। यह शर्त सुनकर अनुसूया अवाक रह गई। फिर मन ही मन ध्यान लगाया और सारी बात समझ गई। तभी उसको एक उपाय सूझा और भगवान से प्रार्थना करते हुए बोली- यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सच्चा है तो ये तीनों साधु छह-छह माह के शिशु बन जाएं। यह कहते ही तीनों देव शिशु रूप में परिवर्तित हो गए और रुदन करने लगे। तब सती अनुसूया के मन में उनके लिए वात्सल्य उमड़ पड़ा और वह उन्हें पुत्र के समान स्नेह करते हुए स्तनपान कराने लगी। बहुत दिन व्यतीत होने पर त्रिदेवों की पत्नियों को चिंता हुई। नारदजी से पूछने लगीं। नारदजी ने कहा कि देवी अब उन्हें भूल जाइए क्योंकि सती अनुसूया ने उन्हें संकल्प बल से शिशु बना लिया है। अब उनके पुत्र के रूप में उनकी गोद में खेलते हैं। यह सुनकर वे हतप्रभ हो गर्इं। अब उन्हें समझ आ गया कि सती अनुसूया की शक्ति के आगे उनके पति बालक बन गए हैं। उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और वे सती अनुसूया के द्वार पर अपने पतियों को प्राप्त करने पहुंचीं। वहां जाकर देखा कि उनके पति तो पालने में खेल रहे हैं। तीनों देवियों ने अपनी दुर्भावना के लिए क्षमा प्रार्थना की और अपने पतियों को पुन: पूर्व रूप में कर देने की विनती की। दया की मूर्ति सती अनुसूया ने पुन: उन्हें उसी रूप में कर दिया। तीनों देवों अब प्रसन्न होकर अनुसूया से वर मांगने को कहा। अनुसूया ने कहा- हे देव! आप तीनों को ही मैं पुत्र के रूप में प्राप्त करना चाहती हूं। देवों ने कहा कि आपकी इच्छा पूरी करते हुए हम तीनों ही आपके गर्भ से जन्म लेंगे। श्रीमद्भागवत पुराण के चतुर्थ स्कंद के दूसरे अध्याय के अनुसार कालांतर में ब्रह्मा जी के अंश से चंद्रमा, शिव के अंश से दुर्वासा और भगवान विष्णु के अंश से दत्तात्रेय प्रभु का जन्म हुआ। दत्तात्रेय जी अपने भक्तों पर शीघ्र कृपा करते हैं और थोड़े पूजा-अनुष्ठान से ही प्रसन्न होकर अपने उपासक को शीघ्र दर्शन देते हैं। उन्होंने 24 गुरुओं से शिक्षा पाई थी। उनकी उपासना की विशेषता यह भी है कि इनकी कृपा प्राप्त कर लेने पर अन्य देवता भी शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।

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