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गीता जयंती मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी (23 दिसम्बर) पर विशेषसंपूर्ण भूमंडल के साहित्य में श्रीमद्भगवतगीता एक अमूल्य, अद्वितीय एवं अनुपम रत्न है। यह आज भी मनुष्य की जरूरत है, खासतौर से जो लोग अंतर्यात्रा पर हैं उनके लिए। हिन्दू धर्म के मुख्य-मुख्य दार्शनिक विचार, वैज्ञानिक सिद्धान्त, धार्मिक तत्व, नैतिक उपदेश, कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि समस्त साधनों का वर्णन इस अमूल्य ग्रंथ में है। जो उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र की भूमि में लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व अर्जुन को दिया था, वह केवल अर्जुन के लिए समस्त मानव जाति के लिए था। मनुष्य जाति के उद्धार व उत्थन के लिए उससे बढ़कर कोई उपदेश नहीं है। पांच हजार वर्षों से यह उपदेश शंखनाद करते हुए अगणित मनुष्यों को उनके कर्तव्य की शिक्षा दे रहा है। जिन क्षत हृदयों में निराशा का अंधकार था, उनमें आशा का प्रकाश कर रहा है। संसार की दार्शनिक, नैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जटिल समस्याओं को सुलझाने में गीता का महत्वपूर्ण योगदान है। भारत का धर्म, भारत का कर्म और भारत का मोक्ष प्रदर्शन पथ गीता ही है। अगणित हिन्दू घरों में इसका श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ होता है।
गीता सार्वजनिक धर्मशास्त्र है। अर्जुन के धर्मसंकट के रूप में मनुष्य मात्र का धर्म संकट निहित है एवं गीता का पथ निर्देश मनुष्य मात्र का जीवन गठन करने में समर्थ है। यह मनुष्य के विकास व विश्वजनीन मानव धर्म का मूल मंत्र है। सब प्रकार के मनुष्यों को, भिन्नस-भिन्नत प्रकार के जीवों को गीता ने भगवत्प्राप्ति का सुन्दर, सुगम एवं प्रशस्त पथ प्रदान किया है। ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ के दिव्य आश्वासन से आश्वस्त कर गीता आज भी हमें पुकार रही है। हमें समस्त चिंताओं से मुक्त होकर गीता की शरण में आ जाना चाहिए।
श्रीमद्भगवतगीता पर महापुरुषों के विचार
गीता विवेक रूपी वृक्षों का एक अपूर्व बगीचा है, सिद्धान्त रत्नों का भंडार है, नवरस रूपी अमृत से भरा हुआ समुद्र है, खुला हुआ परमधाम है, सब विद्याओं की मूल भूमि है, अशेष शास्त्रों का आश्रय है और सब धर्मों की मातृभूमि है-संत ज्ञानेश्वर
मेरे ज्ञान में श्रीमद्भगवतगीता जैसा पृथ्वी मंडल पर दूसरा ग्रंथ नहीं है। गीता धर्म की निधि है। जगत के अनेक विद्वानों ने इसको पढ़कर परमात्मा का तत्वज्ञान तथा निष्काम भक्ति प्राप्त की है-पं. महामना मदन मोहन मालवीय
यदि मनों गीता का आचरणरहित अध्ययन तराजू के एक पलड़े में रखा जाय और दूसरे में तनिक सा भी गीतामय जीवन रखा जाय तो वह पहले की अपेक्षा कहीं अधिक भारी होगा- राष्ट्रपिता महात्मा गांधी
शास्त्रों का अवलोकन करने से और महापुरुषों के वचनों का श्रवण करने से मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि संसार में श्रीमद्भगवतगीता गीता के समान कल्याणकारी अन्य कोई ग्रंथ नहीं है। अत: गीता का अर्थ और भाव सहित मनन करने तथा उसके अनुसार जीवन बनाने के लिए प्राणपर्यन्त प्रयत्न करना चाहिए- ब्रह्मलीन जयदयाल गोयन्दका
गीता का उपदेश किसी भी दिशा या दशा में पड़े हुए प्राणियों को ठीक उपयुक्त मार्ग पर लाकर उन्हें कल्याण की ओर लगा देता है। कर्तव्य मार्ग में प्रवृत्त कर भगवान की ओर गति करा देना ही इसका मुख्य तात्पर्य है- नित्यलीलालीन भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार
गीता समग्र को मानती है। इसलिए गीता का आरंभ और अंत शरणागति में हुआ है। शरणागति से ही समग्र की प्राप्ति होती है- ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदास महाराज
भारतवर्ष के प्रकाशपूर्ण अतीत का गीतारूपी महादान मनुष्य मात्र के उज्ज्वल भविष्य का निर्माता है- एफ.टी. ब्रुक्स
गीता को धर्म का सर्वोत्तम ग्रंथ मानने का यही कारण है कि उसमें ज्ञान, कर्म और भक्ति तीनों योगों की न्याययुक्त व्याख्या है- बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय

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