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पोट्ठपादसुत्त ग्रंथ के अनुसार महात्मा शाक्य मुनि (सिद्धार्थ गौतम) ने दस प्रश्नों का समाधान असंभव तथा व्यावहारिक दृष्टि से व्यर्थ समझा। वे प्रश्न इस प्रकार हैं1- क्या यह लोक शाश्वत है? 2- क्या यह लोक अशाश्वत है? 3- क्या यह शांत है? 4- क्या यह अशांत है? 5- क्या यह अनंत है? 6- क्या आत्मा व शरीर एक है? 7- क्या आत्मा व शरीर भिन्न हैं? 8- क्या मृत्यु के पश्चात तथागत का पुनर्जन्म होता है? 9- क्या मृत्यु के पश्चात तथागत का पुनर्जन्म नहीं होता है? 10-क्या जीव का पुनर्जन्म होगा या नहीं होगा? इसको अव्याकतानि कहा गया है। इनकी संख्या 10 से अधिक भी हो सकती है।
इन प्रश्नों के उत्तर में घोर विवाद व तर्क-विर्तक मिलते हैं। अप्रत्यक्ष विषयों की मीमांसा (व्याख्या) तर्क से नहीं हो सकती। अंतिम ध्येय दार्शनिक तत्वों का विचार नहीं है। इस पर विचारधाराओं के तर्क-विर्तक से विमुक्ति प्राप्त करने में कुछ भी सहायता नहीं मिलती है। जो मनुष्य तर्क के जाल में फंस जाता है वह सत्य का सम्यक दर्शन नहीं कर पाता। दु:खों से पीड़ित रहते हुए भी आत्मा तथा जगत के मूल तत्वों के अनुसंधान में लगे रहना बड़ी भारी मूर्खता है, ठीक उसी प्रकार जैसे शरीर में विषाक्त बाण के चुभे रहने पर उसको निकाल फेकने की बजाय उसको बनाने वाले या फेकने वाले की जाति, रंग, निवास आदि के अनुसंधान में समय नष्ट करना मूर्खता है। सिद्धार्थ गौतम ने ‘अव्याकतानि’ के विषय में विवेचन नहीं किया। इसके बदले उन्होंने दु:ख, दु:ख का कारण, दु:ख निरोध तथा दु:ख निरोध मार्ग जैसे अधिक महत्वपूर्ण विषयों पर उपदेश दिया कि चार आर्य सत्य के विवेचन से लाभ हो सकता है। इसी का धर्म के मूल सिद्धान्तों से संबंध है। इसी चार आर्य सत्य के अवबोध से अनासक्ति, तृष्णाओं का नाश, दु:खों का अंत, मानसिक शांति तथा निर्वाण संभव है। सिद्धार्थ की शिक्षा का सारांश उनके चार आर्य सत्य में निहित है। आर्य सत्यों का उपदेश बुद्ध ने जन साधारण को दिया। चार आर्य सत्य हैं- सांसारिक जीवन दु:खों से परिपूर्ण है। दु:खों का कारण है। दु:खों का अंत संभव है और दु:खों के अंत का उपाय है। इन्हें क्रमश: दु:ख, दु:ख समुदाय, दु:ख निरोध तथा दु:ख निरोध मार्ग कहते हैं। सिद्धार्थ का संपूर्ण उपदेश इन्हीं आर्य सत्यों से संबद्ध है। दु:ख का कारण जाति, जाति का कारण भव, भव का कारण उपादान, उपादान का कारण वेदना, वेदना का कारण स्पर्श, स्पर्श का कारण षडायतन, षडायतन का कारण नाम-रूप, नाम-रूप का कारण विज्ञान, विज्ञान का कारण संस्कार और संस्कार का कारण अविद्या है। इसी अविद्या से निवृत्ति के लिए सम्यक ज्ञान की आवश्यकता है। ज्ञान के समुदय होने से दु:ख तथा दु:ख के कारणों का निवारण हो जाता है। वर्तमान जीवन का कारण अतीत जीवन है और वर्तमान जीवन का प्रभाव भविष्य जीवन पर पड़ता है। इन तीनों की एक श्रृंखला है। अविद्या व संस्कार भूत (विगत) जीवन, विज्ञान, नाम-रूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान और भव ये दस वर्तमान जीवन तथा जाति और जरा-मरण भविष्य जीवन के द्योतक हैं। महात्मा बुद्ध के सभी उपदेशों में ये कड़ियां एक तरह से नहीं हैं किन्तु इस विवरण को प्रामाणिक माना जाता है। दु:ख के कारण से लेकर अविद्या तक के कड़ियों के कई नाम हैं। द्वादश चक्र या भाव चक्र। सिद्धार्थ के इस उपदेश को अनेक बौद्ध चक्र घुमाकर याद करते हैं। माला जपने की तरह चक्र घुमाना भी बौद्धों के दैनिक पूजा-वंदन का एक अंग हो गया है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र
430 बी, आजाद नगर, गोरखपुर

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