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सांख्य मत के अनुसार आत्मा (पुरुष) शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि से भिन्न है। यह सांसारिक विषय नहीं है। मष्तिष्क, स्नायु, मण्डल या अनुभव समूह को आत्मा समझना भूल है। आत्मा वह शुद्ध चैतन्य स्वरूप है जो सर्वदा ज्ञाता के रूप में रहती है, कभी ज्ञान का विषय नहीं हो सकती। पुरुष या आत्मा केवल द्रष्टा है जो प्रकृति की परिधि से परे है और शुद्ध चैतन्य स्वरूप है। इसका ज्ञान प्रकाश सर्वदा बना रहता है। ज्ञान का विषय बदलता रहता है। एक के बाद दूसरा विषय आता है। परन्तु आत्मा या चैतन्य का प्रकाश स्थिर रहता है। वह नहीं बदलता है। आत्मा में कोई क्रिया नहीं होती है, वह निष्क्रिय व अविकारी है। वह स्वयंभू, नित्य और सर्वव्यापी सत्ता है। आत्मा सभी विषयों से रहित और राग-द्वेष से अलग है। जितने कर्म या परिणाम हैं, वे सभी प्रकृति और उसके विकारों (शरीर, मन, बुद्धि आदि) के धर्म हैं। अज्ञान के कारण मनुष्य अपने को शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि समझ बैठता है और परिवर्तन के प्रवाह में पड़कर नाना प्रकार के दु:खों-क्लेशों के दलदल में फंस जाता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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