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सांख्य दर्शन वस्तुवाद और द्वितत्ववाद का प्रतिपादन करता है। यह प्रकृति व पुरुष, इन दो तत्वों के सहारे जगत का उत्पादन करता है। सारा संसार इन्हीं दोनों का खेल है। एक तरफ प्रकृति है जो भौतिक संसार है अर्थात विषय, इन्द्रिय, शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार इन सबके समूह का कारण प्रकृति है। यह प्रकृति संसार का उपादान कारण भी है। यह सक्रिय व निरंतर परिवर्तनशील होती है, परन्तु साथ ही यह अचेतन व जड़ भी है। इस प्रकार अचेतन तत्व से नियंत्रित श्रृंखलापूर्ण जगत का विकास कैसे होता है? यह निश्चित ध्येय की तरफ कैसे बढ़ता है? जब आदि में प्रकृति साम्यावस्था में थी तब फिर पहले-पहले उसमें विकार या क्षोभ क्यों उत्पन्न हुआ? इसके निमित्त सांख्य दूसरे तत्व का आश्रय लेता है, वह है पुरुष या आत्मा। पुरुष शुद्ध चैतन्य रूप आत्मा है जो नित्य व अधिकारी है। पुरुष चेतन होता है परन्तु साथ ही यह निष्क्रिय और अपरिणामी भी, अर्थात इसमें कोई क्रिया या विकार नहीं आता है। इसी चेतन पुरुष के संपर्क से जड़ प्रकृति संसार की सृष्टि करती है। सांख्य का कथन है कि पुरुष के संपर्क से जड़ प्रकृति में क्रिया प्रवर्तन हो जाता है परन्तु पुरुष स्वयं निर्विकार रहता है। इसी तरह पुरुष (चैतन्य) का प्रतिविम्ब ही जड़ बुद्धि पर पड़ने से उसमें ज्ञानादिक क्रियाओं का आविर्भाव हो जाता है। जीवों के गुण, क्रिया, जन्म, मरण और आकृति प्रकृति के वेद से परम पुरुष का एकत्व सिद्ध किया जाता है। समस्त क्रिया-कलाप शरीर का धर्म है, पुरुष का नहीं। व्यावहारिक जगत में हम जिन-जिन वस्तुओं पर दृष्टिपात करते हैं वे अहंकार मात्र कहे जा सकते हैं। अनेक भ्रांतियों के बावजूद सांख्य दर्शन का बहुत महत्व है। आत्मोन्नति और मुक्ति के साधन रूप में इसका बहुत मूल्य है। दु:खों से निवृत्ति का मार्ग तलाशने के लिए यह मूल्यवान है। यह साधक को जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष का मार्ग दिखलाता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

keyword: indian philosophy, sankhya

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