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6 जून 2011 से वृश्चिक राशि में राहु तथा वृष में केतु संचरण कर रहा है। 23 दिसम्बर 2012 को सायं 6 बजकर 39 मिनट पर राहु तुला तथा केतु मेष राशि में संचार करेगा। ये दोनों ग्रह अपनी पिछली राशि में आएंगे क्योंकि ये दोनों ग्रह सर्वदा वक्री गति से चलते हैं। चंद्रमा और पृथ्वी की कक्षा दो विपरीत स्थानों में 180 डिग्री की दूरी पर कटती है। इन दोनों बिन्दुओं को ज्योतिष में राहु-केतु की संज्ञा दी गई है। वैसे तो ये बिन्दु दिखाई नहीं देते परन्तु जब सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण लगता है तो राहु-केतु का अस्तित्व सामने आता है। जिस राशि में राहु भ्रमण करता है उस राशि में सूर्यग्रहण लगता है और जिस राशि में केतु भ्रमण करता है राशि में चंद्रग्रहण लगता है। राहु-केतु परस्पर 180 डिग्री की दूरी पर रहते हैं और राशि चक्र में सदैव उलटी चाल से चलते हैं। ये एक राशि में डेढ़ वर्ष तक रहते हैं और 18 वर्ष में पुन: उसी राशि पर आ जाते हैं जहां से चले थे। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार राहु चंद्रमा व सूर्य का परम शत्रु है। शनि व मंगल इसके मित्र हैं। बुध, गुरु व शुक्र के साथ यह समभाव में रहता है। राहु से दादा, नाना, वैद्य, चिकित्सक, शत्रु, षड्यंत्रकारी का विचार किय जाता है। यह तमोगुणी और काल रंगा का पापी ग्रह है। साप यानी कोबरा इसका प्रतिनिधि जीव है। कुण्डली में जिस भाव में राहु रहता है उस भाव की प्रगति रोकता है। यदि राहु शुभ हो तो व्यक्ति को अति बलवान, साहसी और विधर्मी संप्रदाय से लाभ उठाने वाला बनाता है। यह प्रकृति के अनुसार बहुत ही मदान्ध, घमण्डी, शेखीबाज, तस्करी करने वालों और अंडरवर्ल्ड में काम करने वालों का अधिष्ठाता भी होता है। यदि यह ग्रह धन भाव में बैठ जाय तो व्यक्ति को काले धन का स्वामी बनाता है। राहु की स्वराशि वृष और मिथुन मानी गई है। कुंभ राशि में उच्च तथा सिंह राशि में नीच का माना जाता है। यह उदर विकार, उल्टी, विषजन्य रोग, बात और सूजन करके शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को नष्ट करता है। खराब राहु पलायनवादी, देश त्यागने वाला, तस्करी कराने वाला, षड्यंत्र व अवांछित कर्मों से धन प्राप्त कराने वाला होता है।
केतु भी राहु भांति अशुभ ग्रह माना जाता है। परन्तु सिर व दृष्टि विहीन होने के कारण यह ग्रह अधिक नुकसानदेह नहीं होता है। राहु के समान ही इसकी गति, दृष्टि व राशिगत प्रभाव भी होते हैं। यह धनु व वृश्चिक राशि में उच्च तथा वृष व मिथुन राशि में नीच का होता है। अगर केतु अशुभ हो तो ऊंचाई से गिरने का भय बना रहता है। शुभ केतु जमीन में गड़ा धन, अचानक ही भाग्योदय, राज्यकृपा, जादू-टोने या चमत्कारी कार्य कलापों से धन लाभ कराता है। राहु की भांति केतु भी सूर्य व चंद्रमा का परम शत्रु होता है। यह सौतेले पिता और दत्तक संतान का प्रतिनिधित्व करता है।
तुला राशिस्थ राहु का गोचर फल
मेष- लाभ कम, खर्च अधिक, परिवार में मन-मुटाव। वृष- स्वास्थ्य हानि, परिश्रम अधिक, आय कम। मिथुन-उलझन, परेशानियां। सिंह- धन लाभ, उन्नति। कन्या- तनाव, व्यय अधिक। तुला- शरीर कष्ट, तनाव। वृश्चिक- खर्च अधिक। धनु- धनलाभ, उन्नति। मकर- विघ्न, अड़चन। कुंभ- वाहन सुख की प्राप्ति, वृद्धि। मीन- उन्नति के अवसर।
मेषराशिगत केतु का गोचर फल
मेष- संघर्ष अधिक। वृष- अड़चन परन्तु स्वास्थ्य उत्तम। मिथुन- आय के स्रोत बनेंगे। कर्क- खर्च में वृद्धि। सिंह- धन लाभ। कन्या- आय अच्छी। तुला-उलझन, तनाव। वृश्चिक- विघ्नों के बाद लाभ। धनु- मंगल कार्य पर खर्च। मकर- भूमि सुख। कुंभ- सफलता। मीन- खर्च अधिक।
अनिष्ट राहु की शांति-
तेल, तिल, भूरे रंग का वस्त्र, कंबल, नारियल, सप्तधान्य, कृष्ण पुष्प दक्षिणा सहित दान कल्याणकारी होता है। गोमेद धारण करना उत्तम। बीज मंत्र- ‘ऊं भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:’ का 18 हजार जप एवं गजेन्द्र मोक्ष का पाठ शुभ है।
राहु का गायत्री मंत्र- ऊं शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धिमहि तन्नो राहु: प्रचोदयात।
केतु की अरिष्ट शांति:
लोहा, सप्तधान्य, लाल-काला वस्त्र, नारियल, कंबल, कस्तूरी, वेल, कुष्ठाश्रम आदि में भोजन, दूध का दान और लहसनिया नग धारण करना उत्तम। केतु का बीज मंत्र- ‘ऊं स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नम:’ का 17 हजार जप तथा गणेश स्तोत्र व अपराजिता स्तोत्र का पाठ करना शुभ है।
केतु की शांति के लिए गायत्री मंत्र- ऊं पद्म पुत्राय विद्महे अमृतेशाय धिमहि तन्नो केतु प्रचोदयात।

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