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भारतीय संस्कृति सत्य सनातन है। यह युगद्रष्ट्रा हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा संस्थापित है। मानव जीवन को सुव्यवस्थित रूप देने के लिए ऋषियों ने वेदों की रचना की जिसे श्रुति कहा गया। समस्त वेद-वेदांग संस्कृत भाषा में ही हैं। संस्कृत अर्थात जो स्वयं संस्कारित है, जिसके अंदर किसी प्रकार की विकृति नहीं है। जिसके अंदर विकृति उत्पन्न होती है वह विनाश को प्राप्त होता है। मनुष्यों को मनुष्यत्व प्रदान करने के लिए ऋषियों ने निष्कारण (बिना स्वार्थ के) वेदों एवं उसके छह अंगों- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद व ज्योतिष का अध्ययन करने के लिए मनुष्यों को प्रोत्साहित किया। इसमें ज्योतिष शास्त्र को वेदों का नेत्र का कहा गया है। जिस प्रकार शरीर के सभी अंगों को अपने-अपने कर्तव्य हेतु मार्गदर्शन नेत्र ही करता, उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र प्रकाश स्वरूप आकाश में विद्यमान ग्रहों, नक्षत्रों, तारों की गति, स्थिति, चलन आदि की गणना करते हुए उसके ऊपर विस्तार से प्रकाश डालता है। ग्रह, नक्षत्र, तारे मनुष्यों के लिए अनुकूल-प्रतिकूल कब एवं कैसे होंगे, यह गणना ज्योतिष के द्वारा ही संभव है। यज्ञ, तप, अनुष्ठान, पूजन-अर्चन, यात्रा, संस्कार इत्यादि कब व किस समय करना चाहिए, यह ज्योतिष शास्त्र के द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र तीन स्कंधों में विभक्त है। सिद्धान्त, संहिता व होरा।
सिद्धान्त: ग्रह गणित, पाटी गणित, बीज गणित इत्यादि गणना संबंधी समस्त कार्य सिद्धान्त ज्योतिष द्वारा किया जाता है। इसे ज्योतिष का प्रमुख अंग बताया गया है। इसके ज्ञान से रहित होकर फलादेश नहीं किया जा सकता। इस स्कंध के प्रवर्तक ब्रह्मा, वशिष्ठ, सोम, सूर्य आदि हैं। इनके पश्चात आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, वराहमिहिर, भास्कराचार्य, कमलाकर भट्ट आदि अनेकों आचार्य हुए।
संहिता: संहिता स्कंध में कालचक्र, मुहूर्तादि के विषय में बताया गया है। इसके विषय में वृहत्संहिता प्रामाणिक ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न संहिता ग्रंथ हैं जैसे- नारद संहिता, भृगु संहिता व काश्यप संहिता आदि। इनमें विभिन्न कालचक्रों का वर्णन एवं मनुष्य के ऊपर उसके प्रभाव को बताया गया है।
होरा: होरा को ही फलित ज्योतिष कहा जाता है। इसके जातक व ताजिक दो भेद बताए गए हैं। इसमें वाराहमिहिर का वृहज्जातक व नीलकंठ आचार्य का ताजिक नीलकंठी प्रमुख ग्रंथ है।
मानव समाज में ज्योतिष की उपयोगिता बहुत ही प्रमुख है। आज का विज्ञान भी इसे स्वीकार कर रहा है। इसलिए आज भी ग्रहण, ग्रह गति, ग्रहों की अवस्था, पृथ्वी पर ग्रहों का प्रभाव, सुभिक्ष एवं दुर्भिक्ष, दैवीय प्रकोप इत्यादि विषयों पर बहुत से आचार्यों की भविष्यवाणियां सही होती आ रही हैं। मानवोपयोगी होने के कारण वेदांगों में ज्योतिष ही ज्यादा प्रसिद्ध है। आजकल जन्मकुण्डली, वास्तुशास्त्र, मुहूर्त आदि के विषय में जनमानस बहुत जागरूक हुआ है। आचार्यों ने कहा है- प्रत्यक्षं ज्योतिष शास्त्रं चंद्रार्कौ यत्र साक्षिणौ। अर्थात ज्योतिष शास्त्र प्रत्यक्ष शास्त्र है, सूर्य व चंद्रमा जिसके साक्षी हैं। आज भी जिस दिन जितने बजे सूर्योदय व सूर्यास्त या चंद्रोदय गणित के द्वारा वर्षों पूर्व लिखा होता है, उसी समय पर होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तकों में प्रमुख रूप से 18 आचार्य हैं-
सूर्य: पितामहो व्यासो वशिष्ठोऽित्र: पराशर:।
कस्यापो नारदो गर्गो: मरीचिर्मनुरंगिरा:।।
रोमश: पौलिश्चैव च्यवनो यवनो भृगु:।
शौनकोऽष्टादशाश्चैते ज्योति:शास्त्रप्रवर्तका:।। इसके अलावा भी समय-समय पर अनेकों आचार्य हुए जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र को समृद्ध किया।

dr. jokhan panday shastri

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