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भैरवाष्टमी 6 दिसम्बर को है। भगवान शिव के दो रूप हैं। भक्तों को अभय देने वाला विश्वेश्वर रूप और दुष्टों को दंड देने वाला काल भैरव रूप। जहां विश्वेश्वर स्वरूप अत्यंत सौम्य और शांत है , वहीं उनका भैरव रूप अत्यंत रौद्र, भयानक, विकराल व प्रचण्ड है। शिवपुराण की शतरूद्रसंहिता के अनुसार परमेश्वर सदाशिव ने मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी को भैरव रूप में अवतार लिया। भैरव: पूर्णरूपो हि शंकरस्य परात्मन:। मूढास्तं वै न जानन्ति मोहिता: शिवमायया।।
उत्पत्ति कथा
जब ब्रह्मा अद्भुत मेरुश्रृंग पर निवास कर रहे थे। उस समय ऋषिगण तत्व जानने की इच्छा से वहां आए। देवर्षियों ने कहा कि हे सृष्टिकर्ता! आप हमें सत्य बताइए कि अविनाशी तत्व क्या है। ब्रह्मा ने कहा हे देवर्षियों! आदरपूर्वक सद्बुद्धि से मेरी बात सुनो। मैं यथार्थ रूप से अनन्य तत्व की व्याख्या कर रहा हूं। जगत का मूल कारण, धाता, स्वयंभू, अज, जगत का ईश्वर, अनादि, अद्वितीय, ब्रह्म एवं माया रहित आत्मा मैं ही हूं। मैं ही समस्त जगत का प्रवर्तक व निवर्तक हूं। हे देवताओं! मुझसे अधिक कोई नहीं है। कथा कहती है कि वहां भगवान विष्णु भी उपस्थित थे। ब्रह्मा की बात सुनकर शिवमाया विमोहित भगवान विष्णु ने हंसते हुए कहा - मैं ही परमतत्व हूं। इस बात पर वे दोनों आपस में कलह करने लगे। तब वे दोनों वेद के पास जाकर प्रमाण पूछने लगे। ब्रह्मा और विष्णु ने कहा- हे वेदों! आपकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है। सत्य-सत्य कहिए कि एकमात्र अविनाशी तत्व क्या है। चारो वेदों ने कहा- सबके द्रष्टा परम तत्व भगवान शिव हैं। परन्तु ब्रह्मा और विष्णु इसे मानने को तैयार नहीं हुए और ब्रह्मा ने वेदों की निंदा की। शिवजी ब्रह्मा की अहंकारयुक्त वाणी सुनकर अत्यंत क्रुद्ध हो गए, उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि प्रलय हो जाएगी। उस परमेश्वर ने अपने क्रोध से अत्यंत देदीप्यमान महाभयानक पुरुष उत्पन्न किया और उससे बोले- हे काल भैरव! सर्वप्रथम तुम इस पद्यमयोनि ब्रह्मा को दंड दो। तुम साक्षात काल के समान शोभित हो। अत: कालराज के नाम से विख्यात होगे। संसार का पालन करने में तुम सर्वथा समर्थ हो। भीषण होने से काल भी तुमसे डरेगा। इस कारण काल भैरव हो। तुम रुष्ट होने पर दुष्टात्माओं का मर्दन करोगे, इस कारण सर्वत्र आमर्दक नाम से विख्यात होगे। भक्तों के पाप का तत्काल नाश करोगे, इस कारण पापभक्षण के नाम से विख्यात होगे। हे कालराज! तुम आज सब पुरियों में श्रेष्ठ मेरी काशीपुरी के अधिपति बनकर निवास करोगे। उस पुरी में निवास करते हुए पापी पुरुषों को तुम दंड दोगे।
काल भैरव ने इन वरों को प्राप्त कर अपनी बांयी अंगुलियों के नखाग्र भाग से ब्रह्मा का पांचवां सिर तत्काल काट डाला। उस समय भगवान विष्णु भयभीत होकर शतरूद्रीय मंत्रों से शिवजी की स्तुति करने लगे और ब्रह्मा ने भी काल भैरव की स्तुति व पूजा की। इस प्रकार उन्होंने भगवान शिव की आज्ञा से कापालिक वस्त्र धारण कर काशी का सानिध्य प्राप्त कर काल के भी भक्षक महाकाल हुए।
व्रत विधि
भैरव जी का जन्म मध्याह्न में हुआ था। इसलिए मध्याह्न व्यापिनी अष्टमी लेनी चाहिए। 6 दिसमबर दिन गुरुवार को सूर्योदय 6.45 बजे और अष्टमी तिथि का मान 52 दंड 6 पला अर्थात अर्थात रात्रि 3 बजकर 35 मिनट तक है। मध्याह्न व सायंकाल दोनों समय में अष्टमी होने से यह भैरवाष्टमी के लिए प्रशस्त दिन है। इस दिन प्रात:काल उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प करना चाहिए और भैरव के मंदिर में जाकर वाहन सहित उनकी पूजा करनी चाहिए। ‘ऊं भैरवाय नम:’ इस मंत्र से षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। भैरवजी का वाहन कुत्ता है। अत: इस दिन कुत्तों को मिष्ठान खिलाना चाहिए। इस दिन उपवास करके काल भैरव के समीप जागरण करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है- मार्गशीर्ष सिताष्टम्यां काल भैरव सन्निधौ। उपोष्य जागरण कुर्वन सर्वपापै: प्रमुच्यते।। भैरव जी का पूजन कर निम्न मंत्र से अर्ध्य प्रदान करें-
भैरवार्घ्य गृहाणेश भीम रूपाव्यानघ।
अनेनार्घ्य प्रदानेन तुष्टो भव शिवप्रिय।।

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