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ब्रह्मा ने सृष्टि के बाद मानव कल्याण के लिए दिव्य ज्ञान ज्योतिष शास्त्र के रहस्य को उद्घाटित किया, जिसे होरा शास्त्र कहते हैं। यूं तो कई विधियां हैं जिससे मानव जीवन को आनंदित किया जा सकता है। लेकिन होरा शास्त्र के आधार पर आसानी से स्थायी और तात्कालिक ग्रहों का विचार कर किसी भी समस्या का कारण जान लेना आसान होता है तथा उससे समस्या का समाधान हासिल किया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र में मूल आधार हम जन्म कुण्डली को लेते हैं जिसमें 12 भाव में 12 राशियों की स्थापना कर उसमें जन्मकालिक ग्रहों की स्थापना करते हैं। यह एक स्थूल गणित है। जिससे जातक के बारे में शरीर से लेकर मोक्ष तक के सारे विचार किए जा सकते हैं। ज्योतिष विद्या में ऋषियों के निरंतर शोध से पता चलता है कि समय और स्थान के अनुसार कुण्डलियों का अवलोकन करना चाहिए।
तीन प्रकार की कुण्डलियां मुख्यत: प्रचलन में हैं- लग्न कुण्डली, चंद्र कुण्डली व सूर्य कुण्डली। इन तीनों को जब एक साथ मिलाकर देखा जाता है तो सुदर्शन चक्र बनता है। इन सभी कुण्डलियों में लग्न कुण्डली सूक्ष्म है, इसके जरिए लक्ष्य तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। विज्ञ ज्योतिषी को तो चंद्र कुण्डली देखना ही चाहिए, सूर्य कुण्डली का भी अवलोकन कर लेना चाहिए। सूर्य आत्मकारक ग्रह है। चंद्रमा मन का कारक है। शरीर के लिए ये दोनों पहलू बड़े ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए भी व्यावहारिक हो जाता है कि इन कुण्डलियों का अवलोकन किया जाय। सूक्ष्म गणित में जब प्रवेश करते हैं तो जातक के कल्याण के लिए एक-एक भाव से संबंधित अन्य चार्ट भी बनाने पड़ते हैं, जैसे होरा कुण्डली, द्रेष्काण, सप्तमांश, नवमांश, द्वादशांश, षोडशांश, विंशांश, चतुर्विंशांश, त्रिशांश व षटयांश इत्यादि। लग्न कुण्डली में लग्न से शरीर, द्वितीय स्थान से धन, तृतीय स्थान से पराक्रम, चतुर्थ स्थान से सुख, पंचम स्थान से बुद्धि, षष्ठं स्थान से शत्रु व रोग, सप्तम स्थान से पत्नी व दामपत्य जीवन, अष्टम स्थान से मृत्यु, नवम स्थान से भाग्य, दशम स्थान से कर्म, एकादश स्थान से लाभ व द्वादश स्थान से व्यय का विचार किया जाता है। इन स्थानों में बैठे हुए ग्रह कितने प्रभावशाली हैं, इस आधार पर फलादेश किया जाता है। इसके लिए उस कुण्डली का स्पष्टीकरण होना भी जरूरी है। जिससे ग्रहों के अंश का पता चल सके कि कौन सा ग्रह कितना ताकतवर है। ग्रह की शक्ति के आधार पर ही फल के बलाबल को बताना चाहिए। बैठे हुए ग्रह से फल तो आएंगे लेकिन वही ग्रह बाल्यावस्था, युवावस्था या वृद्धावस्था में से किस अवस्था में है, अवस्था नाम के अनुसार अपना फल देगा। ग्रहों की युति व दृष्टि भी फल को बदल देती है। इसलिए इन बारीकियों को ध्यान में रखते हुए शरीर का विचार लग्न कुण्डली से, धन का होरा कुण्डली, पराक्रम व सहोदर का द्रेष्काण कुण्डली, संतानादिक सुख के लिए सप्तमांश कुण्डली, वैवाहिक व दामपत्य सुख के लिए नवमांश कुण्डली, राज्य सुख व यश-प्रतिष्ठा के लिए दशमांश कुण्डली से विचार करना चाहिए। द्वादशांस कुण्डली से माता-पिता का सुख, षोडशांश कुण्डली से वाहन विचार, विंशांश कुण्डली से मानसिक स्थिति, चतुर्विंशांश कुण्डली से ज्ञान, त्रिशांश कुण्डली से दुर्भाग्य और अंतत: षडयांश कुण्डली से एक बार पुन: सभी क्षेत्रों का विचार कर लेना चाहिए।
इस प्रकार किसी भी क्षेत्र विशेष की कुण्डली विशेष कुण्डली निर्माण के अभाव में फलादेश करना ठीक नहीं है।
इसके साथ ही दशा का विचार भी आवश्यक होता है। जिससे घटना के समय का पता लगाया जा सके। विंध्य पर्वत से उत्तर दिशा में रहने वालों को विंशोत्तरी दशा व दक्षिण दिशा में रहने वालों को अष्टोत्तरी दशा का भी विचार करना चाहिए। योगिनी महादशा के विचार के अभाव में विंशोत्तरी दशा की पुष्टि नहीं हो सकती। इसलिए योगिनी दशा का भी विचार आवश्यक है। बच्चे के जन्म के समय ग्रहों की किरणें प्रथम कैसे पड़ीं, उसके अनुसार ही उस व्यक्ति का निर्माण होता है। इसलिए जन्म कुण्डली देखना आवश्यक होता है कि जन्म के समय ग्रहों का प्रभाव क्या था। सटीक फलादेश के लिए गोचर अर्थात वर्तमान ग्रहों की स्थिति का मिलान कर लेना चाहिए। अर्थात जन्म समय के ग्रह और वर्तमान समय के ग्रहों में क्या संबंध बन रहा है। उस पर अध्ययन कर ही सही फलादेश किया जा सकता है।
आचार्य धनेश मणि त्रिपाठी

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