0
मकर रेखा दक्षिणी गोलार्द्ध में वह अंतिम अक्षांश सीमा है जिसपर सूर्य लम्बवत चमकता है। इसके बाद सूर्य मकर रेखा से उत्तर की ओर बढ़ना शुरू कर देता है। इस प्रकार जब सूर्य मकर रेखा से भूमध्य रेखा, तदुपरांत कर्क रेखा की ओर बढ़ता है, उस समय को उत्तरायण काल कहा जाता है। उत्तरायण को सौम्यायन भी कहते हैं। मकर संक्रांति के दिन से कर्क संक्रांति तक की अवधि उत्तरायण कहलाती है। उत्तरायण देवताओं का दिवस है और दक्षिणायन देवताओं की रात्रि। इस प्रकार मकर संक्रांति से देवताओं का दिन शुरू होता है। इसी कारण मुहूर्त शास्त्र में मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। उत्तरायण काल में ही गृह प्रवेश, देव प्रतिष्ठा, विवाह, मुण्डन, व्रतबंध दीक्षादि शुभ कार्य करने का विशेष महत्व है। निर्णय सिन्धु का वाक्य है- ‘गृहप्रवेशस्त्रिदश प्रतिष्ठा विवाह चौल व्रतबन्ध दीक्षा। सौम्यायने कर्म शुभं विधेयं यद्गगर्हितं तत्खलु दक्षिणायने।।’ दूसरी ओर दक्षिणायन में विवाह, चूड़ाकर्म, जलाशय या देव प्रतिष्ठा, उपवन निर्माण, यज्ञापवीत, अग्न्याधान, चौल, राज्याभिषेक, गृहप्रवेश आदि शुभ कर्मों के निषेध का विधान किया गया है- ‘रात्रिभाग: समाख्यात: खरांशोर्दक्षिणायनम्। व्रतबंन्धादिकं यत्र चूड़ाकर्म च वर्जयेत।।’
सूर्य संक्रांति के दिन शुभ कार्य के लिए निषिद्ध माना गया है। परन्तु प्रत्येक संक्रांति को स्नान, दान एवं पुण्यकर्मों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है। ‘काल विवेक’ में कहा गया है कि जो संक्रांति के समय स्नान नहीं करता है वह सात जन्मों तक रोगी, दु:खी व धनहीन होता है- ‘रविसंक्रमणे पुण्ये या न स्नातीह मानव:। सात जन्मान्तरे रोगी दु:खभंग निर्धनो भवेत्।।’ इस प्रकार शास्त्रों में कथन है कि सूर्य संक्रांति के समय जो कुछ हव्य (हवन के माध्यम से देवताओं को दी जाने वाली आहुति), कव्य (पितरों को दी जाने वाली अन्न की आहुति) एवं दान किया जाता है। ऐसा करने वालों को सूर्य भगवान सात जन्मों तक ये सब क्रमश: प्रदान करते रहते हैं। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य संक्रांति के समय गोचर कुण्डली बनाई जाती है और उसके आधार पर (अष्टकवर्ग एवं गोचर के सिद्धान्तों के आधार अनुरूप) आगामी मास के शुभाशुभ फलों का आंकलन किया जाता है। सूर्य संक्रांति का मेदनी ज्योतिष में भी महत्व है। संक्रांति के समय जो नक्षत्र विद्यमान होता है, उसके आधार पर आगामी मास में शुभाशुभ फलों का आंकलन किया जाता है। इसके अतिरिक्त सूर्य संक्रांति जिस याम, वार, करण आदि में घटित होती है, उसके आधार पर भी शुभाशुभ फल शास्त्रों में बताए गए हैं।
उत्तरायण का संबंध मनुष्य की मृत्यु के बाद की गति से भी है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो मनुष्य उत्तरायण में मृत्यु को प्राप्त होते हैं वे परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जबकि दक्षिणायन में मरने वाले स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस लौट आते हैं। यही कारण है कि महाभारत युद्ध में घायलावस्था में शरशैय्या पर पड़े रहने के बावजूद पितामह भीष्म ने दक्षिणायन में मृत्यु का वरण नहीं किया। उन्होंने मकर संक्रांति की प्रतीक्षा की, ताकि उत्तरायण प्रारंभ हो सके। उत्तरायण में ही उन्होंने अपनी देह का त्याग किया था।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

keyword: hindu, makar-sankranti



नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top