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पंचांग काल गणना के सभी आंकड़ों को एक साथ समाहित करता है। पंचांग में ग्रहों की दैनिक गति, वार्षिक व मासिक गति दी जाती है। वहां उनके द्वारा योग, कुयोग, स्थितियां एवं अन्य विवरण भी उपलब्ध कराए जाते हैं। पंचांग के पांच अंग हैं- तिथि, वार, योग, करण और नक्षत्र। प्रत्येक सौर वर्ष की अवधि 365 दिन के लगभग मानी गई है। इसमें 12 सौरमास परिकल्पित किए हैं। सौर मास सायन नियमों के अनुसार 21 मार्च से प्रारंभ होते हैं जबकि निरयण पद्धति के अनुसार 14 अप्रैल से मेषार्क माना जाता है। भारतीय पंचांगों में नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है जो प्रतिवर्ष मार्च के उत्तरार्द्ध से अप्रैल मास के पूर्वाह्न के बीच में प्रारंभ होता है और पूरे एक सौर वर्ष तक जारी रहता है। पंचांग के जिन पांच अंगों का उल्लेख किया जाता है उससे पहले काल परिचय के कुछ बिन्दुओं को भी जानना चाहिए।
सप्ताह- रविवार से शनिवार तक सात दिनों का एक सप्ताह होता है। उसके साथ 15 दिनों का एक पक्ष और 30 दिन का एक महीना होता है। एक वर्ष में लगभग 52 सप्ताह होते हैं। सप्ताह के अंदर कोई घट-बढ़ नहीं होती।
पक्ष- वैसे तो 15 दिन का पक्ष होता है परन्तु चंद्रमा की कला के अनुसार उत्तरोत्तर कांति वृद्धि में शुक्ल पक्ष व कृष्ण पक्ष की परिकल्पना की गई है। यदा-कदा कोई पक्ष 14 दिन तो कोई 16 दिन का भी हो जाता है। जब चंद्र और सूर्य 0 अंश पर होते हैं तो शुक्ल पक्ष आरंभ होता है, प्रत्येक 12 अंश की दूरी पर एक तिथि की गणना होती है। 0 से 12 अंश तक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (प्रथम तिथि) पुन: 12 से 24 अंश तक द्वितीया तिथि, पुन: 12-12 अंश दूरी पर 180 अंश तक तिथियां बढ़ती जाती हैं। 168 से 180 अंश के मध्य पूर्णिमा तिथि होती है। 180 अंश से प्रत्येक 12 अंश तक आगे बढ़ने पर कृष्ण पक्ष की एक-एक तिथि आती है और 360 अंश से 12 अंश पहले अमावस्या प्रारंभ होती है।
प्रत्येक निरयण (चांद्र वर्ष) में 24 पक्ष होते हैं। परन्तु किसी-किसी वर्ष 26 पक्ष यानी 13 महीनों का निरयण (चांद्र वर्ष) होता है, जिसमें एक महीना अधिक मास की संज्ञा में आ जाता है। अधिक मास को लौंज का महीना भी कहते हैं। भारतीय पंचांग गणना में यही कुछ भाग क्लिष्ट है जिसके कारण हमारा चांद्र वर्ष 365 दिन का न होकर 350 से 380 दिन के बीच पड़ता है। आमतौर से निरयण 355 से 360 दिन का ही होता है। विक्रम संवत् की गणना और संवत्सर विचार पूर्ण रूपेण चांद्र वर्ष के अनुसार होता है।
मास विचार- एक शुक्ल पक्ष तथा एक कृष्ण पक्ष बीत जाने पर यानी 30 दिन के बाद एक चांद्र मास पूरा होता है। इस प्रकार 12 मास का एक वर्ष होता है जिसके नाम क्रमश: चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, असाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ व फाल्गुन हैं।
संवत्सर विचार- समस्त भारतवर्ष में प्राय: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से विक्रम संवत्सर का आरंभ होता है। यह प्राय: मार्च और अप्रैल के मध्य आता है। किन्तु गुजरात, मुंबई आदि दक्षिण- पश्चिम राज्यों में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा यानी दीपावली के अगले दिन से विक्रम संवत्सर का आरंभ माना जाता है।
सौरवर्ष- समस्त विश्व में सौर वर्ष तब होता है जब पृथ्वी सूर्य का पूरा चक्कर लगा लेती है। इसके लिए वेधशालाओं के अनुसार लगभग 365 दिन छह घंटे और 8 सेकेंड के बराबर समय लगता है। इसी कारण अंग्रेजी कैलेंडर में प्रति चौथे वर्ष एक दिन का समय बढ़ जाता है, जिसे लीप ईयर के रूप में फरवरी में समायोजित किया जाता है।
राशि विचार- जब पृथ्वी सूर्य के चारो ओर परिक्रमा करती है जो 360 अंश एक परिभ्रमण बन जाता है। इस 360 के परिभ्रमण पथ को 12 भागों में बांटा गया है। प्रत्येक भाग को एक राशि कहते हैं। राशि का अभिप्राय ढेर या समूह से है जो वास्तव में आकाश में स्थित तारामंडल द्वारा बनाए गए समूह से परिकल्पित होता है। प्रत्येक राशि में कुछ तारों की अवस्थागत पहचान बनाई गई है। मेष राशि के तारों की आकृति भेड़ की तरह है, यह शून्य से 30 अंश परिभ्रमण क्षेत्र में होता है। सौर महीने से वैशाख होता है। वृष राशि 30 से 60 अंश तक, इसकी आकृति बैल के सिर जैसी और इसका सौर महीना ज्येष्ठ है। इसी तरह 60 से 90 अंश तक मिथुन राशि, आकार से जुड़वा बच्चों जैसा, इसका महीना अषाढ़ है। कर्क राशि 90 से 120 अंश परिभ्रमण क्षेत्र में होती है, इसका आकार केकड़े जैसा और सौर महीना श्रावण है। सिंह राशि का परिभ्रमण क्षेत्र 120 से 150 अंत तक है, इसका आकार शेर के मुख जैसा और सौर महीना भाद्रपद है। कन्या राशि का परिभ्रमण क्षेत्र 150 से 180 अंश तक है, इसका आकार कन्या जैसा और सौर महीना अश्विन है। तुला राशि 180 से 210 अंश तक परिभ्रमण क्षेत्र में होती है, इसका आकार तराजू जैसा और सौर महीना कार्तिक है। वृश्चिक राशि 210 से 240 अंश तक के परिभ्रमण क्षेत्र में होती है, इसका आकार बिच्छू जैसा और सौर महीना मार्गशीर्ष है। धनु राशि 240 से 270 अंश तक के परिभ्रमण क्षेत्र में होती है, इसका आकार धनुष जैसा और सौर महीना पौष है। मकर राशि 270 से 300 अंश तक परिभ्रमण क्षेत्र में होती है, इसका आकार मगरमच्छ जैसा और सौर महीना माघ है। कुंभ राशि 300 से 330 अंश परिभ्रमण क्षेत्र में होती है, इसका आकार कुंभ जैसा और महीना फाल्गुन है। मीन राशि 330 से 360 अंश के परिभ्रमण क्षेत्र में होती है, इसका आकार मछली जैसा और सौर महीना है चैत्र है। इस तरह सूर्य प्रतिमास 30 अंश यानी एक राशि को पूरा करते हुए संपूर्ण वर्ष में 12 राशियों को पार करता है। पाश्चात्य मतानुसार 21 मार्च से 30 अप्रैल तक सूर्य मेष राशि में रहता है जबकि भारतीय पद्धति के अनुसार 14 अप्रैल से 14 मई तक सूर्य मेष राशि में रहता है। लगभग 24 दिन का यह अंतर अयनांश यानी सूक्ष्म गणना पद्धति के नियमन के कारण प्रकट होता है।
नक्षत्र विचार- नक्षत्र आकाश में राशि समूह के मध्य स्थित होते हैं। चंद्रमा एक नक्षत्र को पार करता हुआ प्रतिमास सभी 27 नक्षत्रों की यात्रा पूरी कर लेता है। इसी तरह चंद्रमा और सूर्य की अंशात्मक दूरी में जब 13 अंश 20 कला का एक भाग पूरा होता है तो उसे योग कहते हैं। 27 नक्षत्रों की भांति 27 योग भी होते हैं। समस्त आकाश मंडल यानी 360 अंश को 27 से भाग करने पर 13 अंश 20 कला का एक क्षेत्र एक नक्षत्र का दायरा होता है। नक्षत्रों के नाम क्रमश: अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, घनिष्ठा, शतमिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती हैं। योगों के नाम क्रमश: विष्कुंभ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, बज्र, सिद्धि, व्यतिपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र और वैधृति है। चंद्रमा जिस राशि, अंश, कला, विकला में होता है, उस भाग का जो नक्षत्र होता हे, वही उस दिन का नक्षत्र होता है। चंद्रमा की राशि और अंशात्मक अवस्था से नक्षत्र भाग का ज्ञान किया जाता है।
जन्म नाम विचार- भारतीय ज्योतिष नक्षत्र गणना के अनुसार प्रतिपादित किया गया है। प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में एक नामाक्षर की परिकल्पना की गई है। प्रत्येक नक्षत्र की दूरी यानी 13 अंश 20 कला को चार से भाग दिया जाता है तो 3 अंश 20 कला प्राप्त होता है। यही एक चरण होता है। इस तरह नौ चरण की एक राशि बनती है। जैसे अश्विन का चार चरण, भरणी का चार चरण और कृतिका का एक चरण मिलकर 30 अंश होता है। यह मेष राशि कहलाती है। इसी तरह अन्य राशियों में 9 चरण और प्रति 9 चरणों पर एक राशि की परिकल्पना की गई है।
योग- चंद्रमा और सूर्य के के प्रतिदिन प्रात:कालीन स्पष्ट ग्रह के जोड़ने से योगों का निर्माण होता है। ये विष्कुंभादि योग कहे जाते हैं। एक योग और होता है जो वार और नक्षत्र के जोड़ने (योग) से बनता है, जिसका वर्णन आनंद, कालदंड, धूम, धाता के नामों से होता है। जैसे रविवार के दिन यदि अश्विन या मृगशिरा या श्लेषा, हस्त या अनुराधा पड़ जाय तो आनंद नाम का योग होता है। ये कुल 28 प्रकार के होते हैं।
करण विचार- तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। प्रत्येक तिथि का मान 12 अंश अर्थात 24 घंटे होता है। पूर्वार्द्ध में एक करण होता है और तिथि के उत्तरार्द्ध में दूसरा करण होता है। शुक्ल व कृष्ण पक्ष को मिलाकर कुल 30 तिथियां होती हैं। कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा के प्रथम भाग में बालव और द्वितीय भाग में कौलव करण होता है, परन्तु शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में प्रथम भाग किंस्तुघ्न करण और द्वितीय भाग में बव करण होता है। कुल मिलाकर 11 करण होते हैं। जिनके नाम क्रमश: बालव, कौलव, तैतिल, गरन (गर), वणिज, विष्टि, बव, शकुन, नाग, किंस्तुघ्न एवं चतुष्पाद हैं। अंतिम चार करण कृष्ण पक्ष के अंत में यानी चतुर्दशी, अमावस्या व शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन आते हैं।
शुभ-अशुभ योग विचार- आनंद, धाता, सौम्य, श्रीवत्स, धन, मित, मानस, सिद्धि, शुभ, अमृत, मातंग, सुस्थिर एवं प्रवर्धमान योग शुभ होते हैं। इनमें कोई भी कार्य करना लाभकारी होता है। कालदंड, उत्पात, मृत्यु, तथा राक्षस योग अशुभ होते हैं, इनमें अच्छे कार्य नहीं करने चाहिए। अशुभ योगों में भी कुछ घड़िया वर्जित हैं। उन अशुभ घड़ियों का परित्याग कर शुभ कार्य किए जा सकते हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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