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पिड़िया व्रत के नाम से जाने जाना वाला व्रत रुद्रव्रत या गौरीतप व्रत कहलाता है। व्रत का प्रारंभ कार्तिक पक्ष के शुक्ल द्वितीया के दिन होता है। गोवर्धन पूजा के दिन बनी आकृति से गोमय (गोबर) को एकत्र करके शिव परिवार के समस्त गणों की आकृति दीवाल पर बना कर एक मास तक पूजन-अर्चन किया जाता है। इस मास भर कुंवारी कन्याएं भक्ति गीत गाकर पूजन-अर्चन करती हैं। अगहन मास के अमावस्या को विशेष पूजन कर शुक्ल प्रतिपदा के दिन किसी नदी या तालाब में समस्त गोबर की बनी देव प्रतिमाएं (पिड़िया) का विसर्जन कर दिया जाता है।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचन्द्र मिश्र के अनुसार अगहन अमावस्या को निर्जल व्रत रहकर पिड़िया का विशिष्ट पूजन किया जाता है। इसमें प्रतिपदा युक्त अमावस्या ग्राह्य है। 13 दिसम्बर दिन गुरुवार को सूर्योदय 6 बजकर 47 मिनट और अमावस्या तिधि का मान दिन में 2 बजकर 37 मिनट तक है। जो पिड़िया व्रत के लिए मान्य होता है। इस दिन प्रात: काल स्नान करके हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प, दूर्वा और जल लेकर संकल्प करके मध्याहन में नारायण को अर्ध्य देकर पुन: भगवती गौरी की आराधना की जाती है। व्रत में गौरी के ग्यारह नामों का उच्चारण करते हुए अंग पूजन किया जाता है। अंग पूजन के अनन्तर गंध, पुष्प इत्यादि दस उपचारों से पूजन करके और गौरी के दक्षिण भाग में गणेश का व वाम भाग में स्कन्द (स्वामी कार्तिकेय) का पूजन किया जाता है। रात्रि के समय तांबे अथवा मिट्टी के दीपक को गौ के घी से पूर्ण करके आठ बत्ती जलायी जाती है, जो सूर्योदय होने तक प्रज्जवलित रहती है। तीन धातु के पात्र में या मिट्टी के पात्र में गुड़, पकवान और तिल से बने मिष्ठान रखकर भोग लगया जाता है। गोबर की बनी पिड़ियों के सामने अष्ट दल कमल बनाकर कमल के कर्णिका में सोम व शिव का पूजन किया जाता है। नैवेद्य में सुहाली, रसीयाव, मालपूआ, पूड़ी, खीर, घी, शर्करा तथा मोदक आठ पर्दाथों का भोग लगाया जाता है और आठ ब्राह्मणियों को दान किया जाता है। ज्योतिषाचार्य पं. मिश्र ने बताया कि व्रत के दिन भिनसार (भोर) में पिड़ियों का विसर्जन तालाब अथवा नदी में कर दिया जाता है। इस व्रत से स्त्रियों को पति-पुत्र इत्यादि समस्त मनोवाच्छित अभिलाषाओं की प्राप्ति होती है।

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