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इस संपूर्ण संसार में येसु नाम ब्रह्माण्ड में गुंजित ईश्वर की ऐसी अद्भुत है जो अनादि, अनंत, सत्य, शाश्वत, अल्फा, ओमेगा और यहां तक कि समस्त जीव, निर्जीव वस्तुओं में वही प्रथम व अंतिम भी वही है। पवित्र बाइबिल के अनुसार वचन, शब्द या वाणी इसने साकार रूप धारण किया। आज से लगभग दो हजार वर्ष पहले बेतलहम के गौशाले में सृष्टिकर्ता ने अत्यंत साधारण रूप में येसु नाम से देह धारण किया। परन्तु ये सब कुछ एक दिन या एक साल में नहीं हुआ। इसमें वर्षों लगे, युग बीते तब कहीं जाकर उद्धार की योजना बनी। छुटकारे की योजना जो सारे संसार के लिए थी, मानव जीवन का मोक्ष जिसमें निहित था। इसके लिए पात्र चुने गए, समय निर्धारित किया गया, तब कहीं जाकर पूरब दिशा में एक तारा चमका, स्वर्ग के द्वार खुले, जयघोष हुआ, आकाश में परमेश्वर की महिमा और पृथ्वी पर उन मनुष्यों में जिनसे वह प्रसन्न है, शांति हो। परमेश्वर की इस महान योजना या प्रभु येसु के बाल्यकाल काल का सूत्रपात होता है। एक कुंवारी कन्या के चुनाव से जिसका नाम मरियम है। एक किशोरी नवयुवती जिसने ईश वाणी पर विश्वास किया और अपना जीवन, अपनी कोख, अपने वैवाहिक जीवन का भरोसा, सबकुछ परमेश्वर की महिमा के लिए अर्पित कर दिया। जब स्वर्ग दूत ने ईश वाणी सुनाई- हे मरियम भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझपर हुआ है और देख तू गर्भवती होगी और तेरा एक पुत्र उत्पन्न होगा। तू उसका नाम येसु रखना। वह महान होगा और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाउद का सिंहासन उसको देगा। और वह याकूब के घर आने पर सदा राज्य करेगा और उसके राज्य का अंत न होगा। जिस भ्रूण अवस्था में माता के तन से देह निर्माण होता है, हड्डियां बनती हैं, शरीर में रक्त संचरण प्रारंभ होता है, प्रभु येसु के बाल्यकाल का सबसे आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण पहलू यही है। उसने उसी आभृत अवस्था में अपनी माता मरियम के समर्पण का प्रत्युत्तर उसकी सुरक्षा, संरक्षा और सम्मान से दिया। यहां तक कि क्रूस पर जब संसार से विदा लेने का समय था, शरीर रक्त रंजित था, सांसे उखड़ती जा रही थीं, प्रभु येसु जो कुंवारे मरियम से जन्मा था, उसने मां के समर्पण का मोल चुकाया। अपने प्रिय शिष्य युहन्ना को अपनी मां का दायित्व सौंपा- देख ये तेरी मां है। येसु के बाल्यकाल की एक बड़ी रोचक कथा है जो पवित्र बाइबिल में नहीं है किन्तु दंत कथाओं में बड़ी है। प्रभु येसु के जन्म का अद़भुत समाचार सुनकर राजा हेरोडेस इतना घबरा गया कि उसने दो वर्ष तक के सभी बालकों का कत्ल करने की राजज्ञा जारी कर दी। स्वर्ग दूत ने बालक येसु की सुरक्षा के लिए उसके माता- पिता मरियम और यूसुफ को पुन: संदेश दिया कि वे अपने नवजात शिशु येसु को लेकर मिस्र को चले जायं। एक काफिले के रूप में मरियम, यूसुफ जब अपने बच्चे के साथ रात्रि के अंधकार में मिस्र जा रहे थे तो मार्ग में डाकुओं ने काफिले पर आक्रमण कर दिया। उनका सरदार जिसका नाम किंवदंतियों के अनुसार दिदमुस था ने बालक येसु को देखा, ये अद्भुत नजारा था। उस डाकू का हृदय परिवर्तन हो गया। काफिले को बिना उसने लूट जाने दिया। कहते हैं प्रभु येसु के साथ क्रूस पर लटके हुए इसने अंतिम क्षणों में पश्चाताप किया और इस अधम अपराधी, पापी को स्वर्गधाम मिल गया। पवित्र बाइबिल के अनुसार जब बालक येसु 12 वर्ष का हुआ, अपने माता-पिता के साथ फसह का पर्व मनाने वो येरूशलम के विश्व प्रसिद्ध मंदिर में गया। वहां तीन दिन तक याजकों-उपदेशकों से इसका शास्त्रार्थ हुआ। इतनी अल्प आयु में प्रभु येसु की बुद्धि चातुर्य को देखकर बड़े विद्वान, उपदेशक भी चकित रह गए थे। प्रभु येसु का जन्म बाल्यकाल और संपूर्ण जीवन संसार की बेमिसाल घटना थी जिसने संसार में एक नया मार्ग, एक नई जीवन शैली को प्रस्तुत किया।
पादरी विरेन्‍द्र सिंह

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