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नकली शंकराचार्यों से राष्ट्र नष्ट हो रहा है। भ्रष्ट शासन तंत्र को संत के वेश में कुछ लोग चाहिए ही ताकि उसके भ्रष्टाचार व मनमानी पर मुलम्मा चढ़ा रहे। पूरी दुनिया जानती है कि इस देश में मात्र चार शंकराचार्य हैं। लेकिन आज शंकराचार्य के वेश में गली-गली में लोग घूम रहे हैं। इससे समाज गुमराह हो रहा है, राष्ट्र नष्ट हो रहा है।
यह बातें जगद्गुरु शंकराचार्य गोवर्धन पीठ पुरी उड़ीसा के पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कही। वह अपने नेपाल यात्रा के क्रम में सोमवार को गोरखपुर में रुके थे। विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि अंग्रेजों व मुगलों के समय में भी ऐसा नहीं हुआ कि नकली शंकराचार्य बना दिए गए हों। वे बुद्धिमान थे और जानते थे कि यदि हम नकली शंकराचार्य बनाएंगे तो हमारे धर्मगुरु पीर, औलिया भी नकली बनने लगेंगे। लेकिन यहां की सरकारें बुद्धिहीन हैं, यह बात नहीं समझ पातीं। और यदि नकली शंकराचार्यों को बनाने में सरकार शामिल नहीं है तो इस पर प्रतिबंध लगा क्यों नहीं देती कि जो भी नकली शंकराचार्य होगा और जो उसे बनाने वाला होगा उसे आजीवन कारावास और मृत्युदंड तक की सजा हो सकती है। लेकिन उसे भी अपना पाप छिपाने के लिए छद्मवेशी संत चाहिए, इसलिए वह कुछ नहीं करती।
सुदृढ़ समाज की संरचना की बाबत उन्होंने कहा कि वैदिक कर्मकाण्ड व उपासना काण्ड को ताक पर रखकर सुदृढ़ समाज की संरचना नहीं की जा सकती। विवाह के नवीन प्रारूप से उत्कृष्ट संतान की उत्पत्ति संभव नहीं है। ऐसा ही रहा तो मनुष्य भोजन करने व संतान उत्पन्न करने की मशीन मात्र रह जाएगा। भौतिकवाद में विकास की परिभाषा यह है कि वर्णशंकरता व कर्मशंकरता को फैलाओं तो विकास चरम पर पहुंच जाएगा, यही परिभाषा हमारे यहां विनाश की है। यदि विलोप देखना चाहते हो तो वर्णशंकरता व कर्मशंकरता को फैलाओ। आज पुरुष का पुरुष से विवाह हो रहा है, इसे मनोविज्ञान भी सही नहीं मानता। विकास की अंधी दौड़ में मूल्यों का लोप हो रहा है। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि पृथ्वी को धारण करने वाले सात तत्व हैं- गोवंश, विप्र, वेद, सती, सत्यवादी, निर्लोभ व दानशील। महायंत्रों के आविष्कार व प्रयोग के कारण इनका द्रुत गति से विलोप हो रहा है। मनुष्य को नरपिशाच बनाया जा रहा है। जागरूक होने की आवश्यकता है। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि यदि महायंत्रों का आविष्कार नहीं रुका तो कोई भी दिव्य वस्तु सुरक्षित नहीं रह जाएगी। पूरे विश्व में कहीं भी शासन तंत्र वैदिक सनातन संस्कृति के अनुसार नहीं है, हमें वैदिक संस्कृति के अनुसार शासन तंत्र निर्मित करना होगा तभी राष्ट्र का उन्नयन संभव है। गंगा रक्षा के सवाल पर उन्होंने कहा कि असली गंगारक्षक मार दिए गए, भगा दिए गए, उनकी जगह पर सरकार ने अपने एजेंट खड़े कर दिए हैं। वे दिखाने के लिए सरकार का विरोध भी करते हैं और उसकी मंशा के अनुरूप कार्य भी । जब तक गंगा की रक्षा दायित्व सरकारी एजेंटों पर रहेगा, गंगा में सुधार संभव नहीं है। कुंभ मेले की बाबत उन्होंने कहा कि यह पर्व था, माघ मास में सभी ऋषि-महर्षि यहां कल्पवास करते थे। इस दौरान दर्शन पर व राष्ट्र की व्यवस्था कैसे चले, इस पर चिंतन होता है। वहीं से राजाओं को निर्देशित किया जाता था कि राष्ट्र की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए। अब इसे मेले व मजमे का रूप दे दिया गया है। पर्व विकृत हो गया। फिलहाल हम लोग विकृतियों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं। जरूरी है इसमें आम जनता, सामाजिक-सांस्कृति संगठन भी खुलकर आएं।

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