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मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली उत्पन्ना एकादशी इस वर्ष 9 दिसम्बर को है। यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली है। इस दिन व्रत करने वाले व्यक्ति पर नारायण की सदैव कृपा बनी रहती है। जिस तरह सर्पों में शेषनाग, पक्षियों में गरुण, यज्ञों में अवश्वमेध यज्ञ, नदियों में मां गंगा, देवों में भगवान विष्णु और मनुष्यों में ज्ञानवान मनुष्य श्रेष्ठ हैं, उसी तरह समस्त व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। ज्योमतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र ने कहा कि यह व्रत भगवान विष्णु को अतिप्रिय है। इस दिन भगवान अच्युत की पूजा का विशेष विधान हैा
पूजा विधि
पद्यमपुराण के अनुसार व्रती दशमी की रात्रि में एकादशी व्रत के साथ भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए शयन करें। उत्पन्ना एकादशी के दिन प्रात: स्नानादि से निवृत्त होकर संकल्प लें। जितेन्द्रिय होकर श्रद्धा भक्ति से भगवान विष्णु के विभिन्नह नामों का उच्चारण करते हुए विधि-विधान से पूजन एवं आरती करें। व्रती दिन भर उपवास रखें। चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु व लक्ष्मी का चित्र स्थापित कर उनका षोडशोपचार विधि से पूजन करें। ऋतुफल में केला, बिजौरा, नारियल, अनार, अमरूद, नींबू, जमीरा नींबू, आंवला, बेर, सुपाड़ी, पूंगीफल, लौंग इत्यादि चढ़ावें। यत्नपूर्वक देव देवेश्वर भगवान विष्णु के सामने दीपक जलाकर पुष्प, तुलसी की मंजरी, धूप आदि से श्रद्धापूर्वक पूजन-अर्चन करें। उसके बाद जप, हवन, स्त्रोत पाठ करे और प्रदक्षिणा कर दंडवत होवें। इस दिन दीपदान का विशेष महत्व है। पूजन के पश्चात गरीबों एवं ब्राह्मणों को भोजन करावें। यथा शक्ति दान करें। रात्रि में विशेष आरती, पाठ, भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ करते हुए जागरण करें। इस प्रकार दशमी एवं एकादशी के नियमों का पालन करते हुए मनुष्य को एकादशी व्रत रहना चाहिए।
महात्म्य
शंखोद्वार तीर्थ में स्नान करके भगवान गदाधर का दर्शन करने से तथा संक्रांतियों के अवसर पर चार लाख गौवों का दान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है। वह सब एकादशी व्रत के सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं है। प्रभास क्षेत्र में चंद्रमा और सूर्य के ग्रहण के अवसर पर स्नान-दान से जो पुण्य प्राप्त होता है वह निश्चय ही उत्पन्ना एकादशी को उपवास करने वाले मनुष्य को मिल जाता है। केदान क्षेत्र में जल पीने से पुनर्जन्म नहीं होता है। एकादशी का भी ऐसा ही महात्म्य है। यह भी गर्भवास का निवारण करने वाली है। पृथ्वी पर अश्वमेध यज्ञ का जो फल प्राप्त होता है, उससे सौ गुना फल उत्पन्ना एकादशी व्रत रहने वाले को मिलता है। जिनके घर में तपस्वी व श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन करते हैं और उससे जिस फल की प्राप्ति होती है, वह फल उत्पन्ना एकादशी व्रत रहने वाले को अवश्य मिलता है। वेदांगों के पारगामी विद्वान ब्राह्मण को सहस्र गोदान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, उससे सौ गुना पुण्य उत्पन्ना एकादशी व्रत करने वाले को मिलता है। व्रती को वह पुण्य प्राप्त होता है जो देवताओं को भी दुर्लभ है। जीवन जब भगवान विष्णु के प्रिय दिवस एकादशी को उपवास करता है तो समस्त तीर्थ, दान और नियम अपने महत्व की गर्जना करते हैं। यह गोपनीय और उत्तम व्रत है।
कथा
मुर नामक राक्षस को नष्ट करने के लिए मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी के दिन भगवान विष्णु के शरीर से एकादशी देवी उत्पन्न हुईं और क्षण मात्र में अपने हुंकार से उस महादैत्य को राख का ढेर बना दीं। इस कारण इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहते हैं। भगवान नारायण ने उसे वर प्रदान किया कि जो इस तिथि पर व्रत, उपवास व जागरण कर दान-पुण्य का कार्य करेगा, उसका पुण्य अक्षय हो जाएगा।

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