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कीरो पद्धति: कीरो की पद्धति में मूलांक, भाग्यांक व नामांक तीनों का उपयोग फलादेश के लिए किया जाता है। कीरों ने प्रत्येक वर्णों के साथ अंकों का निर्धारण अपने सिद्धान्त के आधार पर किया है। कीरो ने अपनी तालिका में 9 अंक का प्रयोग नहीं किया, मात्र 8 अंक तक ही रखा।
कीरो पद्धति सारणी
अंक वर्ण
1 ए, आई, जे, क्यू, वाई
2 बी , के, आर
3 सी, जी, एल, एस
4 डी, एम, टी
5 ई, एच, एन, एक्स
6 यू,वी, डब्ल्यू
7 ओ, जेड
8 एफ, पी
व्यक्ति के मूलांक व भाग्यांक को तो बदला नहीं जा सकता क्योंकि ये प्रारब्ध के अनुसार ही व्यक्ति को प्राप्त होते हैं तथा परमात्माकृत प्राकृतिक भी हैं। लेकिन नामांक को बदल सकते हैं, नामांक में परिवर्तन कर नाम को शुभ बना सकते हैं। ताकि जीवन भर सकारात्मक प्रभाव मिल सके।
सेफेरियल पद्धति- यह पद्धति हिब्रू यानी यहूदियों की परंपरागत पद्धति है। सेफेरियल, हिब्रू अर्थात यहूदी पद्धति के अंक शास्त्री माने जाते हैं। इस पद्धति में प्रत्येक वर्ष के साथ-साथ अपने परंपरागत अंकों का भी निर्धारण किया जाता है। इसमें भी कीरो की भांति अंक 9 का चयन नहीं किया गया है। लेकिन यह पद्धति कीरो की पद्धति से थोड़ी भिन्न है। इसमें ग्रहों के आपसी संबंधों की भी गणना की जाती है।
सेफेरियल पद्धति सारणी
अंक वर्ण
1 ए, आई, जे, क्यू, वाई
2 बी, सी, के, आर
3 जी, एल, एस
4 डी, एम, टी
5 ई, एन
6 यू, वी, डब्ल्यू, एक्स
7 ओ, जेड
8 एफ, एच, पी
पाइथागोरस पद्धति- पाइथागोरस को पश्चिमी जगत में अंक शास्त्र का जनक माना जाता है। इन्होंने अपनी पुस्तक ‘दुर्लभ परिसंवाद’ में यह उल्लेख किया है कि व्यक्ति के विचार, व्यवहार व आकृति अंकों द्वारा ही नियंत्रित होती है। अर्थात सभी के मूल में अंक ही उत्तरदायी होते हैं। इसमें प्रत्येक वर्ण के साथ-साथ अंकों का निर्धारण किया गया है जो कीरो व सेफेरियल पद्धति से थोड़ा अलग है। इन्होंने अपनी तालिका में अंक 9 को भी गणना में लिया है।
पाइथागोरस पद्धति सारणी
अंक वर्ण
1 ए, जे, एस
2 बी,के, टी
3 सी, एल, यू
4 डी, एम, वी
5 ई, एन, डब्ल्यू
6 एफ, ओ, एक्स
7 जी, पी, वाई
8 एच, क्यू, जेड
9 आई, आर
अंकों की मित्रता व शत्रुता
जिस प्रकार ग्रहों की आपस में मित्रता, शत्रुता होती है, उसी प्रकार अंकों में भी आपस में मित्रता, शत्रुता होती है। ग्रहों के आपसी मित्रता, शत्रुता के आधार पर अंकों की मित्रता, शत्रुता निर्धारित की जाती है। प्रत्येक ग्रह का एक निर्धारित अंक है। ग्रहों को दो समूहों में बांटा गया है।
समूह प्रथम- सूर्य, चंद्रमा, वृहस्पति, मंगल
समूह द्वितीय- बुध, शुक्र, शनि, राहु, केतु
समूह प्रथम के चारो ग्रह आपस में अति मित्रता रखते हैं तथा समूह द्वितीय के पांचों ग्रहों से अति शत्रुता रखते हैं। ठीक इसी प्रकार इसका विलोम भी सत्य है कि समूह द्वितीय के पांचों ग्रह आपस में अति मित्रता तथा समूह प्रथम के चारो ग्रहों से अति शत्रुता रखते हैं। इसमें कुछ ग्रह सम स्वभाव भी रखते हैं। यह पंचधा मैत्री चक्र के अंतर्गत आता है।
आचार्य शरदचंद्र

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