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एरिस्टाटल का कथन है कि वस्तु जगत के प्रत्येक तत्व में दो बातें पाई जाती हैं- एक तो उसका द्रव्य और दूसरा उसका स्वरूप। स्वरूप तो सामान्य है जो एक जाति के सभी तत्वों में समान हैं। द्रव्य विशेषता का जनक है। द्रव्य परिणाम व गति का आधार है। इसके कारण प्रत्येक तत्व परिवर्तित व गतिशील बने रहते हैं। इस संसार की प्रत्येक वस्तु द्रव्य और स्वरूप का सम्मिश्रण है। इस जगत में द्रव्य और स्व्रूप को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। यहां तक कि एक के बिना दूसरा नहीं रह सकता। अत: इस संसार में किसी वस्तु को विशुद्ध द्रव्य या विशुद्ध स्वरूप की संज्ञा नहीं दी जा सकती। विशुद्ध द्रव्य है मूल प्रकृति और विशुद्ध स्वरूप है ईश्वर। एक में पूर्ण जड़ता है और दूसरा पूर्ण चैतन्य। एक शुद्ध कर्म है और दूसरा शुद्ध ज्ञान। एक गति और परिणाम स्वरूप है तो दूसरा निश्चल और कूटस्थ। ये दोनों इस संसार के माता-पिता हैं। संसार की प्रत्येक वस्तु इन माता-पिता के गुणों का सम्मिश्रण है। अत: संसार के प्रत्येक वस्तु में द्रव्य व स्वरूप का सम्मिश्रण होना अनिवार्य है। द्रव्य को एरिस्टाटल साध्य और स्वरूप को सिद्ध कहते हैं। साध्य में सुप्त शक्ति होती है जिसको जगाने पर कुछ बन सकता है, अर्थात किसी स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। मूल प्रकृति शुद्ध साध्य है, उसका कोई स्वरूप नहीं है, उसमें पूर्ण जड़ता है। ईश्वर शुद्ध सिद्ध है, उसमें पूर्ण चैतन्य है। हमारे संसार की प्रत्येक वस्तु साध्य व सिद्ध का मिश्रण है। हमारा संसार परिणामी और गतिशील है। परिणाम और गति एक निश्चित लक्ष्य के कारण है। विश्व में विशिष्टाद्वैत है। भेद में अभेद अंतर्निहित है। संसार के विविध पदार्थ इस अभेद को पाने के लिए गतिशील हैं। गति या परिणाम वस्तुत: विकास है- द्रव्य का स्वरूप की ओर विकास, साध्य का सिद्ध की ओर विकास। प्रत्येक गति या परिणाम के चार चरण होते हैं- 1- उपादान कारण, 2- निमित्त कारण, 3- स्वरूप कारण और 4- लक्ष्य कारण। उदाहरण के लिए संगमरमर की प्रतिमा को लिया जाय। इसके लिए आवश्यकता है- संगमरमर की, निर्माता की, मस्तिष्क में प्रतिमा के स्वरूप की और प्रतिमा बनाने के लक्ष्य की। एरिस्टाटल ने द्रव्य और स्वरूप के अतिरिक्त निमित्त और लक्ष्य को भी स्वीकार किया है। साध्य या द्रव्य को सिद्ध या स्वरूप बनने के लिए निमित्त कारण की, जो गति या परिणाम उत्पन्न कर सके और उस लक्ष्य की, जिसकी ओर वह प्रगति कर रहा है, आवश्यकता है। सृष्टि का आदि निमित्त कारण ईश्वर है, जो स्वयं अगतिशील और अपरिणामी होते हुए भी सारी गति और परिणाम का जनक है और वही सृष्टि का चरम लक्ष्य है, जिसको प्राप्त करने के लिए सृष्टि गतिशील है। संसार की प्रत्येक वस्तु में एक अखंड तारतम्य है। प्रत्येक वस्तु अपने से ऊपर की वस्तु के लिए द्रव्य है और नीचे की वस्तु के लिए स्वरूप। बीज से वृक्ष बनता है और वृक्ष की लकड़ियों से पलंग। बीज में वृक्ष छिपा है और वृक्ष में पलंग। बीज में वृक्ष बनने की और वृक्ष में पलंग बनने की सुप्त शक्ति है। यह साध्य है किन्तु अभी सिद्ध नहीं हुआ। यह कमी है, अभाव है, जिसे दूर किया जा सकता है। बीज में वृक्ष का स्वरूप छिपा है, सुप्त है, जब जब बीज वृक्ष बन जाता है तो स्वरूप सिद्ध हो जाता है। बीज की दृष्टि से वृक्ष स्वरूप है, किन्तु पलंग की दृष्टि से वृक्ष द्रव्य है। दूसरा उदाहरण यह कि मिट्टी से घास उगती है और गाय द्वारा घास खायी जाती है और घास रक्त के रूप में परिणत होती है। मिट्टी के लिए घास स्वरूप है किन्तु रक्त के लिए घास द्रव्य है।
साधारण पत्थर कालांतर में संगमरमर बनता है और संगमरमर से प्रतिमा बनाई जाती है। साधारण पत्थर के लिए संगमरमर स्वरूप है किन्तु प्रतिमा के लिए द्रव्य। एरिस्टाटल ने सुप्त शक्ति और जाग्रत शक्ति में भेद किया जो महत्वपूर्ण है। साध्य में सुप्त शक्ति है जो जाग्रत अवस्था में सिद्ध बना देती है। जिसमें सुप्त शक्ति न हो, उसे साध्य नहीं कह सकते हैं। एरिस्टाटल के अनुसार गति और परिणाम ही विकास है। इस विकास का विभिन्न श्रेणियों में तारतम्य है। बालक युवक बनता है। बालक साध्य है, युवक सिद्ध। व्यवहार में पहले बालक होता है और बाद में युवक। किन्तु वस्तुत: युवक बालक में पहले ही छिपा होता है अन्यथा बालक युवक नहीं बन सकता। विकास की श्रेणी में ऊपर की श्रेणी सुप्त या गुप्त रूप से नीचे की श्रेणी में विद्यमान है और नीचे की श्रेणी विकसित होकर प्रकट रूप में ऊपर की श्रेणी बन सकती है। वस्तु जगत में और विज्ञान जगत में वास्तविक भेद नहीं है। सामान्य या विज्ञान सिद्ध है और वस्तुएं साध्य। परमार्थ व्यवहार में अंतर्निहत है और व्यवहार परमार्थ की ओर विकसित हो रहा है। साध्य जब सिद्ध बन जाता है और द्रव्य जब स्वरूप लाभ कर लेता है, उस अवस्था को एरिस्टाटल ने सिद्ध सत्ता का नाम दिया। असली सिद्ध सत्ता तो ईश्वर की है जो इस जगत को आकर्षित कर रहा है और यह जगत उसकी ओर विकसित हो रहा है। जैसे सिद्ध साध्य में अंतर्निहित है और उसका लक्ष्य है। वह सिद्ध है और जगत साध्य। वह ही एक मात्र परम सिद्ध है। उसकी शक्ति पूर्णत: जाग्रत है। वह नित्य है। वह विज्ञान स्वरूप है। उसमें जड़ता का सर्वथा अभाव है। वह स्वयं अगतिशील व अपरिणामी है किन्तु समस्त गति और परिणाम का कारण है। वह ही सबका लक्ष्य है। वह सृष्टि में अंतर्यामी है। सृष्टि उसके बाहर नहीं है। वह सृष्टि के बाहर रहने वाला सृष्टिकर्ता नहीं है। वह पूर्ण अद्वैत रूप है। वह प्रपंचातीत है। सृष्टि उसके स्वरूप की प्राप्ति के लिए विकासशील है। यही एरिस्टाटल के दार्शनिक विचारों और तत्व विज्ञान का सार है। वे निगमन तर्क के जनक हैं और इनका तर्कशास्त्र आज भी उसी रूप में पढ़ाया जाता है। उन्होंने मनोविज्ञान, प्राणिविज्ञान, भौतिक विज्ञान, राजनीति, आचार शास्त्र, सौन्दर्य शास्त्र, साहित्य शास्त्र पर भी काफी लिखा है। उनकी प्रतिभा असाधारण है और उनका कार्य अत्यंत व्यापक व महत्वपूर्ण है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र
430 बी, आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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  1. Bilkul Sahi kaha Aristotle ne. Badhiya post.

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