2
संस्कृति का संबंध हमारे धर्म से है। नाना विचारधाराएं, नाना पंथों के रहते हुए भी हमारे पूर्वज एकता में नानात्व व नानात्व में एकता को देखने का पाठ पढ़ा गए हैं। हमें इन्हीं सूत्रों को दृढ़ करने की आवश्यकता है। अनेक परंपरागत संस्कारों से ी जति, समुदाय,देश व राज्य की संस्कृति बनती है। हमारी एक विशेषता यह रही है कि भारतवर्ष में नाना धर्म, नाना पंथ, नाना विचारधारा के रहते हुए भी सब एक सूत्र में बंधे रहे। यदि न बंधे रहते तो एक हजार वर्ष की भयंकर दासता, विदेशी प्रभुता का सुदीर्घकाल में हमारी संस्कृति जीवित नहीं रह पाती। भारतीय संस्कृति ने स्वतंत्र रूप से संसार के ईर्ष्यालु राष्ट्रों में परस्पर शांति, समृद्धि व सौजन्य का सुन्दर उपाय बताया है। महाभारत के शांति पर्व में कहा गया है- ‘आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्’ जो बात, जो व्यवहार स्वयं हमें नहीं भाता है उस प्रकार का व्यवहार हम दूसरों से न करें। ‘यन्येषां हितं न स्याद् आत्मन: कर्म पौरुषम्’ हमारे जिन कर्मों और पौरुष से दूसरों का हित बिगड़ता है उन कर्मों और पौरुष को प्रयत्न कर त्याग देना चाहिए।
भारतीय संस्कृति की परंपरा संसार की अन्य संस्कृतियों से भिन्न रही है। शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, धर्म की रक्षा करने के लिए अपने बलिदान करने वाले सिख धर्म के दस गुरुओं, स्वामी दयानंद सरस्वती, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, समर्थ गुरु रामदास, चैतन्य महाप्रभु, कबीर, स्वामी विवेकानंद आदि असंख्य भारतीय धर्मगुरुओं ने लोकहित के लिए जीवन पर घोर परिश्रम, प्रयत्न करते रहे। भगवान बुद्ध जब अपनी लीला समाप्त करने लगे तो उनके प्रिय शिष्यों ने कतारबद्ध होकर प्रश्न किया- आप तो महानिर्वाण की ओर जा रहे हैं, अब हमारा मार्गदर्शन कौन करेगा? बुद्ध ने कहा कि जब तक संसार में एक प्राणी बंधन में है तब तक मुझे मुक्ति की कोई कामना नहीं है। मैं मानव मात्र के उत्कर्ष और कल्याण के लिए बार-बार जन्म लेता रहूंगा और शरीर का उत्सर्ग करता रहूंगा। भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तार के लिए गुरु-शिष्य की प्रशस्त परंपरा रही है। इस परंपरा में शरीर का संबंध नहीं रहा है। साधक का जीव गुरु के जीव का शिष्य बनता है। इसीलिए गुरु के शरीर त्याग के पश्चात भी उनसे शिष्य को निर्बाध प्रेरणा मिलती रहती है। साधक मानव मात्र के कल्याण के लिए सर्वदा तैयार रहे हैं। एकलव्य, आरुपि, उद्दालक, धौम्य, नचिकेता आदि का चरित्र अध्ययन से भारतीय संस्कृति पर गर्व किया जा सकता है।
भारतीय संस्कृति की एक विशेषता यह भी है कि यह महापुरुषों को जन्म देती है। भारतीय संस्कृति का आधार धन, अर्थ, लाभ व विलासिता कभी नहीं रहा। इस संस्कृति ने जीवन के बाह्य स्तर की चिंता कभी नहीं की। भारतीय संस्कृति मानती है कि सत्य तो परमात्मा है, वास्तविक उन्नति आत्मिक उन्नति है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र
430 बी, आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

keyword: bhartiya sanskriti

नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा

Post a Comment

  1. Bohat dinon baad ek achche hindi blog se parichay hua.

    ReplyDelete
  2. kisalay raiJanuary 22, 2013

    vahi ghisi piti purani baate.......jo itihas ho chuki hain....kuchh nya chahiye...na aaj k guru dronacharya hain aur na hi aaj k shisya eklavya...aaj kal to guru matuknath jaise hote hain

    ReplyDelete

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top