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19वीं शताब्दी में धर्म सुधार आंदोलनों में ब्रह्म समाज को सर्वप्रमुख तथा प्रथम स्थान प्राप्त है। ब्रह्म समाज की स्थापना 1928 ई. में राजा राम मोहन राय ने की थी। इनका जन्म 1972 ई. में बंगाल के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इनकी आरंभिक शिक्षा पटना में हुई थी। आप संस्कृत, फारसी तथा अंग्रेजी भाषा के विद्वान थे तथा अरबी, लैटिन व ग्रीक भाषाओं में पारंगत थे। उन्होंने हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, उपनिषद तथा अन्य धर्मग्रंथों विशद अध्ययन किया था। 1805 ई. में राजा राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी प्रारंभ की तथा शीघ्र ही उच्च पद को प्राप्त कर लिया। उस समय देश के लोगों पर इसाई धर्म तथा पाश्चात्य संस्कृति का इतना गहरा रंग चढ़ा था कि वे अपनी प्राचीन गौरवपूर्ण संस्कृति व सभ्‍यता को भूलने लगे थे। ऐसे वातावरण में राजा राम मोहन राय ने लोगों में अपने धर्म तथा राष्ट्र की स्वतंत्रता के प्रति चेतना पैदा की। इसके अलावा उन्होंने अनेक धार्मिक तथा सामाजिक सुधार भी किए। उन्होंने हिंदू धर्म में विद्यमान अनेक कुरीतियों का समूल नाश करने का प्रयत्न किया। सती प्रथा को समाप्त करने के लिए उन्होंने कठोर परिश्रम किया। इसके अलावा उन्होंने बहु विवाह प्रथा, बाल विवाह, बेमेल विवाह, कन्या वध, दहेज प्रथा, छुआछूत, कन्या विक्रय, जाति-पांत आदि कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन किया।
ब्रह्म समाज के सिद्धान्त
ईश्वर केवल एक है तथा उसी ने संपूर्ण सृष्टि की रचना की है। ईश्वर की पूजा आत्मा की शुद्धि के साथ करनी चाहिए। समस्त धर्मों की शिक्षाओं से सत्य ग्रहण करना चाहिए। ईश्वर की उपासना तथा प्रार्थना से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। ईश्वर के प्रति पितृ भावना, मनुष्य जाति के प्रति भातृ भावना तथा प्राणि मात्र के प्रति दया की भावना रखना ही धर्म है। ईश्वर की आराधना का समस्त वर्णों एवं जातियों को समान अधिकार है। पूजा के लिए किसी आडम्बर की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर सभी की प्रार्थना सुनता है तथा पाप एवं पुण्य के अनुसार ही दंड या पुरस्कार देता है।

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