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जन्म पत्रिका में राहु एवं सूर्य की युति एक राशि अथवा भाव में हो तो ग्रहण योग का निर्माण होता है। सूर्य और राहु के मध्य जितनी कम दूरी होती है, उतना ही ग्रहण योग प्रभावी होता है। आधुनिक विद्वानों की मान्यता है कि भले ही राहु और सूर्य भिन्न राशियों में हों परन्तु उनके मध्य यदि 10 अंश से कम की दूरी हो तो ग्रहण योग बन जाता है। गोचर में राहु एवं सूर्य से निर्मित ग्रहण योग का निर्माण लगभग एक माह के लिए होता है और वर्ष में केवल एक बार ही होता है। राहु और सूर्य से निर्मित ग्रहण योग होने पर जातक को नेत्र संबंधी रोग होता है। ऐसे जातकों की नेत्र ज्योति कम होती देखी गई है। ऐसे जातकों को पिता का सुख भी कम प्राप्त होता है। सूर्य कुण्डली में जिस भाव का स्वामी होता है, उस भाव से संबंधित शुभ फलों में कमी आ जाती है।
इसी तरह राहु एवं चंद्रमा की युति से भी ग्रहण योग बन जाता है। राहु और चंद्रमा में जितनी दूरी कमी होगी, उतना ही ग्रहण योग प्रभावी होगा। यदि जातक का जन्म पूर्णिमा को हुआ है तो कई बार उसके जन्म के समय आकाश में ग्रहण भी होता है। गोचर में राहु और चंद्रमा से निर्मित यह योग वर्ष में 12 बार बनता है। इस प्रकार बनने वाले कुल 12 योगों की समयावधि लगभग एक माह रहती है। राहु एवं चंद्रमा से निर्मित ग्रहण योग होने पर जातक मनोरोगी हो सकता है। यदि यह ग्रहण योग लग्न, अष्टम इत्यादि भावों में बन रहा हो तो जातक मिरगी इत्यादि रोगों से प्रभावित हो सकता है। इस योग के फलस्वरूप जातक पर जादू, टोना, नजर इत्यादि का भी प्रभाव अधिक होता है। नेत्र विकार, स्मरण शक्ति में कमी, मानसिक विचलन, जल की कमी या अधिकता से संबंधित रोग जातक को परेशान करते हैं। इसके अतिरिक्त अज्ञात भय, बुरे सपने आना, आत्मविश्वास में कमी आने से भी जातक परेशान रहता है। कॅरियर के निर्माण में भी जातक को झटके खाने पड़ते हैं और उसे आरंभ में संघर्ष का सामना करना पड़ता है।
राहु, सूर्य व चंद्रमा तीनों ग्रहों की युति से निर्मित ग्रहण योग प्रबल होता है। ऐसे जातक का जन्म अमावस्या के समीप होता है। यदि राहु, चंद्रमा एवं सूर्य के परस्पर अंशों में अधिक अंतर नहीं होता है तो आकाश में सूर्यग्रहण भी घटित होता है। राहु, सूर्य एवं चंद्र इन तीनों से निर्मित ग्रहण योग वर्ष में केवल एक बार ही होता है और यह योग लगभग सवा दो दिन तक रहता है। राहु, सूर्य एवं चंद्रमा से निर्मित ग्रहण योग की स्थिति में जातक को नेत्र एवं मनोरोगों से पीड़ा प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति अज्ञात भय से पीड़ित रहता है। वह शीघ्र ही अवसाद में आ जाता है। उसका बाल्यकाल व वृद्धावस्था संघर्षमय रहता है। जीवन में एक बार गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। राहु एवं सूर्य अथवा चंद्रमा अथवा दोनों की युति से निर्मित ग्रहण योग का फल निर्माता ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में प्राप्त होता है। राहु महादशा में सूर्य की अंतर्दशा हो अथवा सूर्य की महादशा में राहु की अंतर्दशा हो तो राहु एवं सूर्य निर्मित ग्रहण योग के फल अधिक मिलते हैं। इसी प्रकार राहु एवं चंद्रमा से निर्मित ग्रहण योग के फल राहु महादशा में चंद्रमा की अंतर्दशा अथवा चंद्रमा की महादशा में राहु की अंतर्दशा होने पर प्राप्त होते हैं।
उपाय- इन ग्रहों के मंत्रों का जप नित्य प्रति किया जाय। इसके अतिरिक्त राहु, चंद्रमा एवं सूर्य से संबंधित दान पदार्थों को शनिवार, सोमवार और रविवार को दान किया जाय। ग्रहों के यंत्रों को धारण किया जाय। राहु मंत्र- ऊं रां राहवे नम:। चंद्र मंत्र- ऊं सों सोमाय नम:। सूर्य मंत्र- ऊं घृणि: सूर्याय नम:। राहु के लिए काला उड़द, चंद्रमा के लिए श्वेत चावल और सूर्य के लिए गेहूं का दान ग्रहों से संबंधित दिनों में करना हितकारी माना जाता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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