2
प्राचीन ज्योतिष वाङमय में कतिपय योगों का वर्णन है जिसमें प्रेम विवाह का उल्लेख है। प्रेयसी का विचार पंचम भाव से किया जाता है और सप्तम भाव से विवाह का विचार। यदि सप्तमेश का पंचमेश के साथ किसी भी प्रकार का संबध या राशि परिवर्तन होता है तो प्रेम विवाह होता है। जब स्त्री की कुण्डली में मंगल और पुरुष की कुण्डली में शुक्र मित्र राशि में रहता है तो प्रेम विवाह होता है और सफल भी रहता है। स्त्री जातकों के लिए प्रेयसी के बदले प्रेमी शब्द का प्रयोग किया जाता है और ऐसा माना जाता है कि पुरुषों का आगमन मंगल के प्रभाव से और स्त्रियों का जन्म शुक्र के प्रभाव से होता है। यदि कुण्डली में कहीं भी सप्तम भाव के स्वामी और लाभ भाव के स्वामी की युति हो या परस्पर दृष्टि संबंध हो तो भी प्रेम विवाह हो जाता है। पंचमेश व सप्तमेश की युति यदि केन्द्र या त्रिकोण भावों में हो और इन दोनों पर वृहस्पति की पूर्ण दृष्टि हो तो यह निश्चित प्रेम विवाह का योग बनता है।
यदि मंगल व शुक्र की युति अथवा मंगल पर शुक्र की दृष्टि हो या दोनों में राशि परिवर्तन हो अथवा ये ग्रह पंचम व सप्तम भाव से संबंध रखते हों तो जातक विपरीत लिंग के व्यक्ति की ओर आकर्षित होता है। किसी स्त्री व पुरुष के मध्य प्रेम संबंध होने के लिए उनकी जन्म पत्रिका में मंगल, शुक्र व चंद्र की स्थिति का महत्वपूर्ण स्थान है। नवांश कुण्डली में भी उपरोक्त योग हो तो भी प्रेम संबंध का योग बन जाता है। यदि पुरुष की जन्म कुण्डली में और स्त्री की कुण्डली में शुक्र और मंगल की युति हो और इन दोनों पर शनि या राहु की दृष्टि हो या इन दोनों ग्रहों (शनि, राहु) से भी युति हो जाय तो आपस में प्रेम हो जाता है और विवाह पूर्व शरीरिक संबंध भी बन जाते हैं। पापी ग्रह का शुक्र (पुरुष की कुण्डली में) और मंगल पर (स्त्री की कुण्डली) में दृष्टि पड़ जाय या युति हो जाय तो भी प्रेम संबंध हो जाता है। चंद्रमा या शुक्र या दोनों ग्रह अगर मिथुन या धनु राशि में स्थित हों तो एकतरफा प्रेम होता है। अगर पूर्व लिखित योगों पर वृहस्पति की दृष्टि या युति हो तो प्रेम पवित्र और सच्चा होता है। चंद्रमा और शुक्र यदि तुला राशि में हों या इन दोनों ग्रहों की दृष्टि तुला राशि पर हो तो भी पवित्र प्रेम होता है। नैसर्गिक शुभ ग्रह का पंचम भाव पर प्रभाव हो तो प्रेम में सफलता मिलती है। यदि नैसर्गिक पाप ग्रह का प्रभाव पंचम भाव पर हो तो प्रेम संबंधों में असफलता मिलती है। यदि नैसर्गिक पापी ग्रहों का चतुर्थ भाव से संबंध हो तो स्वार्थ से भरा प्रेम होता है।
प्रेम संबंध कब बनता है- पंचमेश अथवा शुक्र की अंतरदशा में प्रेम संबंध स्थापित होने की प्रबल संभावना रहती है या जब वृहस्पति गोचर में जातक की जन्मपत्रिका के पंचम, नवम अथवा एकादश भाव में विचरण कर रहा हो तो प्रेम संबंध स्थापित होता है। गोचर में जब राहु जन्म पत्रिका के पंचम अथवा सप्तम भाव हो तो भी प्रेम संबंध बन सकता है।
सफलता रहित प्रेम विवाह- ऐसा देखा जाता है कि प्रेम विवाह होकर कुछ दिन बाद संबंध टूट जाते हैं। जब पंचमेश और सप्तमेश मंगल और शनि के साथ षष्ठम, अष्ठम या बारहवें भाव में हो तो प्रेम विवाह टूटने के आसार बनते हैं। यदि प्रेम विवाह का योग है और योगों पर राहु अथवा केतु की दृष्टि है तो प्रेम विवाह सफल नहीं होता है।
उपाय- यदि प्रेम विवाह के बाद अनबन का योग आए तो वैदिक मंत्र- ‘समञ्जन्तु विश्वेदेवा समापो हृदयानि नौ। सम्मातरिश्वा सन्धाता समुदेष्ट्री दधातु नौ’ का 42000 जप कराया जाय एवं पंचमेश और सप्तमेश ग्रह के मंत्र का जप करें या कराएं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, गोरखपुर

keyword: jyotish, falit-jyotish
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा

Post a Comment

  1. Mr. dwivedi, i must congratulate you for writing such beautiful articles. I have read a few and i must say each of them is inspiring, knowledgeable and unique. i will keep coming back for more.
    thanks

    ReplyDelete
  2. Divediji bahut khoob kaha hai aapne. Likhte rahiye.....

    ReplyDelete

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top