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गणेश चतुथी व्रत 30 जनवरी को, अर्घ्य का समय रात्रि 8.41 बजेमाघ मास में कृष्ण पक्ष चतुर्थी को संकटहर या संकष्टी चतुर्थी या संकटा चौथ कहा जाता है। यह गणेशजी का व्रत है। पुराणों के अनुसार इसी दिन गणेशजी का जन्म हुआ था। गणेशजी की पूजा केवल मनुष्य ही नहीं करते बल्कि देवगण भी अपने कार्यों के आरंभ में करते हैं। श्रीगणेश जी समस्त विघ्नों का नाश करने वाले, विद्या, बुद्धि, संपन्नता व समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं।
व्रत निर्णय- निर्णय सिंधु के अनुसार ‘गणेश व्रते तु तृतीया युतैव। ‘चतुर्थी तु तृतीयायां महापुण्य फलप्रदा। कर्तव्या व्रतिभिर्वत्स गणनाथ सुतोषिणी’ इति हेमाद्रौ ब्रह्मवैवर्त्तात्।।’ ऐसा ब्रह्मवैवर्त पुराण का कथन है कि गणेश व्रत में तृतीया युक्त चतुर्थी लेना चाहिए। तृतीया में चतुर्थी अत्यधिक पुण्य देने वाली है। यह गणेशजी को प्रसन्न करती है। हृषिकेश पंचाग के अनुसार 30 जनवरी दिन बुधवार को सूर्योदय 6.35 बजे और तृतीया तिथि का मान 10 दंड 30 पला अर्थात दिन में 10.47 बजे तक है। इसके बाद चतुर्थी तिथि लग रही है। यही तिथि इस व्रत के लिए मान्य है। बुधवार को भगवान गणेश का दिन माना जाता है इसलिए यह तिथि और पुण्यदायी है। यद्यपि गणेशजी की कृपा प्राप्ति के लिए और भी अनेक व्रत हैं परन्तु सभी व्रतों में गणेश चतुर्थी प्रधान है। शंकरजी त्रिपुर दैत्य को जीतने के लिए, भगवान श्रीविष्णु ने बलि को बांधने के लिए, ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण के लिए, शेषजी पृथ्वी धारण के लिए, दुर्गाजी ने महिषासुर वध के समय, सिद्ध लोग अपनी सिद्धि के लिए व कामदेव ने विश्व विजय के लिए सर्वप्रथम गणेशजी का ध्यान और पूजन किया था- ‘चैतुं यस्त्रिपुरं हरेण हरिणा व्याजाद्बलिं बध्नता। स्रष्टं वादिभवोद् भवेन भुवनं शेषेण धर्तु धराम। पार्वत्या महिषासुर प्रथमने सिद्धाधिपै: सिद्धये। ध्यत: पञ्चशरेण विश्व विजये पापात्स नागानन:’ ऐसा पुराण का कथन है।
कैसे करें पूजा
इस दिन प्रात:काल स्नान के अनंतर देवाधिदेव गणेश जी की प्रसन्नता के लिए व्रतोपवास का संकल्प करके दिन भर संयमित रहकर गणेशजी का स्मरण, चिंतन एवं भजन करते रहना चाहिए। चंद्रोदय के समय मिट्टी की गणेश मूर्ति बनाकर या सुपाड़ी में गणेशजी का आवाहन कर उसे पीढ़े पर या काठ के आसन पर स्थापित करें। गणेश जी के साथ उनके आयुध और वाहन का भी आवाहन करें। स्थापना के अनंतर षोडशोपचार से उनका भक्ति पूर्वक पूजन करें। पुन: मोदक तथा गुड़ में बने हुए तिल के लड्डू, शकरकंद का नैवेद्य अर्पित करें। आचमन कराकर पुन: अर्घ्य प्रदान करें। चंद्रोदय के समय गणेशजी के लिए तीन, चंद्रमा के लिए सात अर्घ्य देना चाहिए। आमतौर पर यह व्रत महिलाओं में ज्यादा प्रचलित है।
चंद्रमा को अर्घ्य क्यों?
इसका उल्लेख ‘व्रतराज’ में किया गया है कि शिरोच्छेन के अनंतर गणेशजी का वास्तविक सिर चंद्रलोक में चला गया और यह मान्यता है कि आज भी वहां विद्यमान है। पूजन करने के पश्चात एवं अर्घ्य देने के बाद आचमन, प्रणाम और परिक्रमा आदि के अनंतर गणेश गायत्री ‘ऊं महोल्काय विद्महे वक्रतुण्डाय धिमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्’ का जप करें।
अर्घ्य का समय- रात्रि को 8.41 बजे चंद्रोदय है। इसी समय अर्घ्य प्रदान किया जाय।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तयमपुर, गोरख्पुतर

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