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सिखों के अंतिम गुरू श्री गुरू गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर सन् 1666 को हुआ। गुजरी जी तथा गुरू तेग बहादुर साहिब के सुपुत्र गुरू गोबिंद सिंह बचपन से तीर-कमान तथा फौजी साजो-सामान वाले खेल ही खेलते तथा उनके सभी साथी उन्हें अपना सरदार मानते थे। उन्होंने पटना में पांच वर्ष व्यतीत किया तथा उसके बाद पिता गुरू तेग बहादुर साहिब के बुलाने पर मां के साथ अनंदपुर साहिब चले गये। वहां उन्होंने फारसी, हिंदी, संस्कृत, ब्रज भाषा आदि का प्रशिक्षण लिया। इसके साथ ही घोड़े की सवारी और शस्त्र विद्या का भी विशेष रूप से अभ्‍यास करवाया गया।
शहीदी देने के लिए दिल्ली जाने से पहले पिता गुरू तेग बहादुर ने अपने सुपुत्र गुरू गोबिंद सिंह को गुरियाई बख्‍श दी। उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 9 वर्ष की थी। गुरू तेग बहादुर साहिब की शहीदी के पश्चात यह आवश्यक हो गया कि फौज तैयार करके हुकूमत से टक्कर ली जाए। लिहाजा सिखों में शस्त्र-विद्या के अभ्‍यास को तेज कर दिया गया। 52 कवि रखकर वीर-रस भरपूर साहित्य तैयार करवाया गया। सन् 1680 में एक बड़ा नगारा तैयार करवाया गया जिसका नाम ‘रणजीत नगारा’ रखा गया। जब-जह नगारे पर चोट पड़ती, सिखों के मनों पर वीर रस छा जाता। शस्त्र-विद्या के साथ-साथ राग विद्या का भी विशेष प्रबंध किया गा। गुरू जी को स्वयं कीर्तन का बहुत शौक था। वे ताऊस कमाल का बजाते थे। सन् 1685 से 1688 तक गुरू गोबिंद सिंह रियासत नाहन में रहे। यमुना के किनारे, सन् 1685 में पाउंटा साहिब गुरुद्वारा बनवाया। यहां उन्होंने ‘जपु साहिब’, ‘सवैये’ और ‘अकाल उस्तति’ वाणियों की रचना की। सितंबर, 1688 में भंगानी का युद्ध हुआ, जिसमें कहिलूर के राजा भीम चंद ने पहाड़ी राजाओं को साथ मिलाकर गुरू गोबिंद सिंह पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में गुरू जी की बूआ बीबी वीरो जी के पांचों पुत्रों ने और मामा कृपाल चंद ने भाग लिया। पीर शाह, चारों पुत्र, दोनों भाई और 700 मुरीद शामिल हुए। युद्ध में पहाड़ी राजाओं की हार हुई तथा बीबी वीरो के पुत्र संगो शाह और जीत मल्ल और पीर बुद्धु शाह के दो पुत्र व एक भाई शहीद हुआ। गुरू गोबिंद सिंह ने अगले दिन पीर बुद्धू शाह को एक कटार, एक सुंदर पोशाक तथा अपना एक हस्तलिखित हुकमनामा बखशा। पीर बुद्धू शाह ने गुरू जी का कंघा मांग लिया। आधी दस्तार पीर बुद्धू शाह को और आधी दस्तार महंत कृपाल दास को बखश दी गई।
भंगाणी के युद्ध के पश्चात अक्टूबर सन् 1688 में गुरू गोबिंद सिंह वापिस अनंदपुर आ गये और दिसंबर 1704 तक वहीं रहे। सन् 1699 को वैसाखी के दिन गुरू जी ने केसगढ़ के अस्थान पर पांच प्यारों का चुनाव किया और अमृतपान करवा कर खालसा पंथ तैयार किया। 22 दिसंबर सन् 1704 को शुरू हुए चमकौर के युद्ध में बड़े साहिबजादे बाबा अजीत सिंह तथा बाबा जुझार सिंह शत्रुओं को कुचलते हुए शहीद हो गए। वहीं छोटे साहिबजादे सरहिंद में नींहों में चिनकर शहीद कर दिये गये। गुरू जी ने गांव दीने में पहुंचकर औरंगजेब को फारसी में एक पत्र लिखा, जिसको जफरनामा (विजय का पत्र) कहा जाता है। यह जफरनामा भाई दया सिंह जी औरंगजेब के पास लेकर गये थे। सन् 1705 में ‘मुक्तसर’ में मुगल फौजों से घमासान युद्ध हुआ, जिसमें माई भाग कौर एवं भाई महां सिंह जत्थेदार बहादुरी से लड़े। भाई महां जी शहीद हो गये। शहीद सिंहों का जहां संस्‍कार किया गया, वहां आज ‘गुरुद्वारा शहीद गंज’ बना हुआ है। मुक्तसर से गुरू गोबिंद सिंह तलवंडी साबो पहुंचे, जहां उन्होंने मनी सिंह जी से श्री गुरू ग्रंथ साहिब की बीड़ तैयार करवाई, जिसमें गुरू तेग बहादुर साहिब जी की वाणी भी संकलित की। 20 फरवरी सन् 1707 को औरंगजेब मारा गया। बहादुर शाह ने तख्त पर बैठने के लिए गुरू जी की सहायता मांगी। उन्होंने भाई दया सिंह और भाई धर्म सिंह जी के नेतृत्व में एक जत्था भेजा। तख्त बहादुर शाह के हाथ लगा। सितंबर 1708 में गुरू गोबिंद सिंह नांदेड़ पहुंचे, जहां वे बैरागी लक्ष्मण दास से मिले। उस को सिंह सजाया और ‘बाबा बंदा सिंह’ बनाकर पंजाब की ओर भेजा।
उसी महीने तीसरे सप्ताह में वजीर खां सूबा सरहिंद के भेजे हुए दो पठानों ने एक रात धोखे से गुरू जी पर कटार पर प्रहार कर दिया। दोनों पठान मारे गये और एक जर्राह ने गुरू गोबिंद सिंह के घाव को धोकर साफ कर के टांके लगा दिये और मरहरम पट्टी कर दी। 6 अक्टूबर 1708 को कमान पर चिल्ला चढ़ाते समय सिले हुए घाव फट गये। घावों को दोबारा सिला तो गया लेकिन गुरू जी को अपने अंत समय का आभास हो गया था। उसी दिन उन्होंने दीवान सजाया और संगतों के भारी इकट्ठ में हुक्म किया कि शखसी गुरियाई का सिलसिला समाप्त किया जाता है। गुरू ग्रंथ और पंथ ही साझे रूप में गुरू होंगे। गुरू ग्रंथ साहिब जी को माथा टेककर ‘आत्मा ग्रंथ में और शरीर पंथ में’ कर कर सदा के लिए गुरियाई श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी को बखश दी। 7 अक्टूबर, सन् 1708 की
ऊषाकाल को गुरू जी ज्योति-ज्योत में समा गये।
स्वाति श्रीवास्तव

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