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धर्म व्यक्ति की संवेदना को परिष्कृत करने वाली विद्या है। अध्यात्म का महत्व संसार के महानतम वस्तुओं से भी ऊंचा है। जीवन को चरम लक्ष्य तक ले जाने वाले चार पुरुषार्थों में से एक है धर्म। पुरुषार्थ चतुष्टय में सवाधिक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ जो मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया है वह धर्म है। बलात अपने संप्रदाय में मिलाना व कर्मकाण्ड आदि धर्म नहीं हैं। इस विषय में आदि शंकराचार्य का मत है- जगत: स्थिि‍त कारणं प्राणिनां साक्षात् अभ्‍युदय नि:श्रेयस हेतु: य: स: धर्म:। परमात्मा के बनाए नियमों के अनुरूप इस संसार का भरण पोषण हो रहा है। उसके शासन के अतर्गत जीवनचर्या का निर्धारण और सर्वांगीण अभ्‍युदय का नाम धर्म है। महाभारत में कहा गया है- कर्मणा बध्यते जन्तुविद्यया तु प्रमुच्यते अर्थात जीव कर्म से बंधता है और विद्या से मुक्त होता है। सकाम कर्म अज्ञानमूलक है और निष्काम कर्म स्वयं ज्ञान या विद्या की अभिव्य्क्ति है। श्रुति कहती है- ऋते ज्ञानान्न मुक्ति:। अर्थात आत्मज्ञान के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। सनातन संस्कृति मानव को देव बनाने वाली प्रक्रिया का प्रशिक्षण तत्वज्ञान के माध्यम से देती आई है। स्वर्ग और मोक्ष अध्यात्म जगत को दो पुण्य फल माने गए हैं। सनातन संस्कृति में कहा गया है कि सुकर्मों से इस जीवन में तथा जीवन के पश्चात पूर्ण सुख प्राप्त किया जा सकता है। साधना और ज्ञान द्वारा शरीरोपरान्त जीवनमुक्त हुआ जा सकता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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