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सनातन संस्कृति की मान्यताओं में प्रथम स्थान अवतारवाद का है। सनातन संस्कृति मानती है कि जीवन का अंत नहीं होता है। जीव नाना योनियों में जन्म लेता है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात जीव मनुष्य जैसी दुर्लभ शरीर को प्राप्त करता है। पुनर्जन्म में विश्वास सनातन संस्कृति की दूसरी विशेषता है। जब पृथ्वी पर पाप भाव बढ़ जाता है तब ईश्वर का अवतार होता है और वह अपनी शक्ति व सामर्थ्य से से संसार का भार हल्का कर पुण्य की स्थापना करता है। भगवान का अवतार नीति और धर्म की स्थापना के लिए होता है। दुराचार, छल, कपट, धोखा, भय, अन्याय को दूर कर मनुष्य के हृदय में देवत्व की स्थापना करता है। आस्तिकता सनातन संस्कृति की तीसरी विशेषता है। सनातन संस्कृति ईश्वर की सत्ता में अखंड विश्वास करती है। ईश्वर सर्वव्यापक है। विष्णु पुराण में कहा गया है- यस्यान्त: सर्वभेदमच्युतस्या लयात्मक:। तमाराधयगोविन्दं स्थानमग्रयं यदीच्छसि।। यदि तू श्रेष्ठ स्थान का इच्छुक है तो जिस अविनाशी अच्युत परमात्मा में यह संपूर्ण जगत ओतप्रोत है, उस गोविन्द की अराधना कर। सनातन संस्कृति यह मानती है कि ईश्वर शक्तिशाली है। असंख्य नेत्रों से हमें और हमारे कार्यों, गुप्त मंतव्यों, बुरी भावनाओं, झूठ-कपट, मिथ्या आदि को वह देखता है और नाना रूपों में हमें सजा देता है। इसलिए हमें नीच वृत्तियों से बचना चाहिए। कर्मफल में विश्वास सनातन संस्कृति की चौथी विशेषता है। इसमें कर्म की गति पर गहन विचार किया गया है। कहा गया है कि जो कुछ प्राप्त होता है वह अपने कर्मों के कारण प्राप्त होता है। महाभारत में कहा गया है- स्वकर्म निरतो यो हि स यश: प्राप्नुयान्महत्। मनुष्य का लक्षण कर्म है। कर्म करते हुए वह मनुष्य बनता है। जो सुकर्म में संलग्न है वह बड़े भारी यश को प्राप्त करता है। कर्म को तीन भागों में विभाजित किया गया है- संचित कर्म, प्रारब्ध और क्रियमाण। पूर्व किए गए कर्मों को संचित, वर्तमान में कर्म और उसके फल को प्रारब्ध और कालान्तर में कर्मफल की प्राप्ति को क्रियमाण कहा गया है। कर्म और उसका फल एक ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल कभी न कभी उसका भोग करना ही होता है। जीवन की गूढ समस्या पर चिंतन सनातन धर्म की पांचवीं विशेषता है। यह संस्कृति कहती है कि मनुष्यों जीवन का मर्म समझो। जीवन गूढ़ समस्या पर विचार करो। जीवन अखंड है, इस सत्य को समझो और हृदयंगम करो। यह सर्वोपरि लाभ अध्यात्म को मानती है। अध्यात्म का महत्व संसार के महानतम वस्तुओं से भी ऊंचा है। इसके अलावा यह संस्कृति जीवन को चरम लक्ष्य तक ले जाने वाले चार पुरुषार्थों पर भी बल देती है। चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। ये चारो चार स्तंभ हैं तथा मानव जीवन की यात्रा की अनिवार्यताएं हैं। इनके बिना जीवन का प्रगति रथ अपनी यात्रा पूरी नहीं कर सकता। व्यक्ति द्वारा चाहे गए दो ही प्रयोजन या लक्ष्य हैं- काम और मोक्ष। इन दोनों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए दो ही साधन हैं- अर्थ और धर्म। दो साध्य हैं और दो साधन। जिनसे मनुष्य लक्ष्य सिद्धि की ओर बढ़ता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र 
430 बी, आजाद नगर, गोरखपुर

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