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‘जन्मना जायते शूद्र: संस्कारात् द्विज उच्यते’ मनु जी का यह कथन है। शूद्र का तात्पर्य संस्कार विहीन और द्विज का तात्पर्य दुबारा जन्मा हुआ अर्थात संस्कार के माध्यम से समुन्नत व्यक्ति। व्यक्तित्व निर्माण के तर्कसंगत माध्यमों को ही संस्कार कहते हैं। इसको इस तरह भी कहा जा सकता है कि संस्कार वे उपचार हैं जिनके माध्यम से मनुष्य को सुसंस्कृत बनाया जाता है। बालक के गर्भ में प्रवेश करने से लेकर जीवन यापन की विविध परिस्थितियों से गुजरते हुए शरीर छोड़ने तक के विविध अवसरों पर संस्कारों का आयोजन करने हमारे धर्मशास्त्रों में विधान है। इन विधानों से व्यक्ति अंत:चेतना पर विशेष प्रभाव पड़ता है। हिन्दू धर्म में सोलह संस्कार हैं। 1- गर्भाधान। 2- पुंसवन। 3- सीमन्तोनयन। 4- जातकर्म। 5- नामकरण। 6- निष्क्रमण। 7- अन्नप्राशन। 8- चूड़ाकर्म। 9- कर्णवेध। 10- वपन। 11- स्नान (व्रत स्नान)। 12- यज्ञोपवीत। 13- विद्यारंभ। 14- समावर्तन। 15- विवाह। 16- अंत्येष्टि।
गर्भाधान- आर्य पुरुष अपनी स्त्री के समीप अच्छे संतति की प्राप्ति के लिए पवित्र मधुर भोजन ग्रहण कर निश्चित तिथि और रात्रि में पवित्रता लेकर समागम के लिए जाते थे। यह गर्भाधान संस्कार कहलाता है।
पुंसवन- यह संस्कार गर्भस्थ शिशु के तीसरे माह में संपन्न किया जाता है। तीसरे माह में गर्भस्थ शिशु का आकार प्रारंभ हो जाता है। इसमें गर्भिणी महिला खीर और औषधियों का हवन करती है, पश्चात अवशिष्ट खीर का प्राशन करती है।
सीमन्तोनयन- यह गर्भस्थ शिशु का तृतीय संस्कार है। इसमें प्रतीकों द्वारा माता को श्रेष्ठ चिंतन के विषय में बताया जाता है। इसमें वेदमंत्रों का उच्चारण भी होता है।
जातकर्म- जब बालक पैदा हो जाता है, उस समय उसका प्रसूति स्नान इत्यादि किया जाता है। इसमें षष्ठी देवी की अर्चना भी होती है। मांगलिक श्लोकों द्वारा उसके दीर्घायु होने की कामना की जाती है।
नामकरण- बालक के जन्म दिन के दसवें या बारहवें दिन के पश्चात यह संस्कार किया जाता है। आचार्य एक सुसज्जित थाली में लिखा नाम सबको दिखाकर मंत्रोच्चार के साथ नाम की घोषणा करते हैं व शिशु का नाम लेकर उसके चिरंजीवी और प्रगतिशील होने के नारे लगाते हैं।
निष्क्रमण- बालक के जन्म के कुछ दिन पश्चात यह संस्कार संपन्न किया जाता है। इसमें बालक के दीर्घायु होने की कामना के लिए देवगणों की अर्चना की जाती है और प्रसाद इत्यादि का वितरण व सहभोज का आयोजन होता है।
अन्नप्राशन- गोभिल गृह सूत्र के अनुसार यह शिशु के जन्म के छठें महीने में संपन्न किया जाता है। इसमें प्रथम अन्न ग्रहण कराने के साथ यह भावना की जाती है कि बालक सुसंस्कारी अन्न ग्रहण करे। इसमें सुपाच्य खीर, मधु, घी, तुलसी व गंगाजल का मिश्रण कर मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ भगवान के प्रसाद के रूप में बच्चे को खिलाया जाता है।
चूड़ाकर्म- शिुश के सिर के बालों को प्रथम बार वपन करने को चूड़ाकर्म या मुण्डन कहा जाता है। शास्त्रीय एवं लोक विधा के अनुसार यह बालक के प्रथम या तृतीया अथवा पांचवें वर्ष में संपन्न किया जाता है।
कर्णवेध- कर्णवेध संभावित रोगों से बचाने हेतु किया जाता है। यह नर-नारी दोनों के लिए है। अब यह बालिकाओं के लिए आभूषण धारण हेतु रह गया है।
वपन- चूड़ाकर्म के पश्चात द्वितीय बार सिर के बालों को उतारने को वपन कहा जाता है। इसे टुण्डन भी कहते हैं। मुण्डन के समान इसमें भी देवताओं की अर्चना की जाती है।
स्नान व्रत- इस संस्कार में बालक के पिता द्वारा व्रत रखकर पवित्र जल में औषधियों का प्रक्षेपण कर मंत्रों से बालक को स्नान कराया जाता है। यह आरोग्यता के दृष्टिकोण से उत्तम संस्कार है।
यज्ञोपवीत- यज्ञोपवीत व्रत बंधन है। इस प्रक्रिया के एक-एक कर्मकाण्ड में महत्वपूर्ण प्रेरणाएं छिपी हैं। सामान्यतया यह संस्कार 7 से 11 वर्ष के अंदर कर दिया जाता है।
वेदारंभ- यज्ञोपवीत संस्कार के पश्चात पठन-पाठन में संलग्न होने को विद्यारंभ कहते हैं। इसमें वेदों का अध्ययन भी सम्मिलित है।
समावर्तन- पूर्ण विद्याध्ययन के बाद पुन: गुरु गृह से गृहस्थ जीवन की ओर आने को समावर्तन संस्कार कहते हैं। इसमें गुरु को दक्षिणा देने की प्रथा है। इसमें भी हवन और कर्मकाण्डों को संपन्न किया जाता है।
विवाह- विवाह संस्कार दो आत्माओं की पवित्र बंधन प्रक्रिया है। इसमें दो प्राणी अपना पृथक अस्तित्व समाप्त कर सम्मिलित इकाई बनाकर परिवार रूपी संस्था की नींव डालते हैं।
अंत्येष्टि- मृत्यु के पश्चात जीवात्मा को सद्गति प्रदान करने के लिए यह संस्कार किया जाता है।
                                                                                              आचार्य शरदचंद्र मिश्र

keyword: sanskar, hindu dharm

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  1. अब तो इन्हें भूलते ही जा रहे हैं ...संग्रहणीय पोस्ट

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