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सत (सत्व), रज, तम ये तीन गुण प्रकृति में रहते हैं। इन तीनों गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। यहां गुण का अर्थ धर्म नहीं है। प्रकृति का विश्लेषण करने पर हम इसमें तीन प्रकार का द्रव्य प्राप्त करते हैं। इन्हीं का नाम त्रिगुण है। अत: सत, रज, तम ये मूल द्रव्य प्रकृति के उपादान द्रव्य हैं। ये गुण इसलिए कहलाते हैं कि ये रस्सी के रेशों की तरह आपस में मिलकर पुरुष के लिए बंधन का कार्य करते हैं अथवा इसलिए कि पुरुष के उद्देश्य साधन के लिए गौण रूप से सहायक हैं।
गुण प्रत्यक्ष नहीं देखे जाते हैं। सांसारिक विषयों को देखकर उनका अनुमान किया जाता है। कार्य-कारण का तादात्म्य रहता है। इसलिए विषय रूपी कार्यों का स्वरूप देखकर हम गुणों के स्वरूप का अनुमान करते हैं। संसार के समस्त विषय - सूक्ष्म बुद्धि से लेकर स्थूल पत्थर, लकड़ी, पर्वत- में ये तीनों गुण पाए जाते हैं। एक ही वस्तु एक के मन में सुख और दूसरे के मन में दु:ख और तीसरे के मन में औदासिन्य का सृष्टि करती है। जैसे संगीत रसिक को आनंद, बीमार को कष्ट और भैंस को हर्ष या विषाद कुछ भी नहीं देता। जज का फैसला एक पक्ष के लिए आनंददायक, दूसरे पक्ष के लिए कष्टदायक और गैर लोगों के लिए नजीर होता है। नदी सैर करने वाले के लिए आनंद की वस्तु है, डूबने वाले के लिए मृत्यु स्वरूप है और उसमें रहने वाले जीवों के लिए साधारण वस्तु है। कार्य का गुण कारण में बना रहता है। विषयों के मूल कारण में सुख, दु:ख और मोह के तत्व विद्यमान रहते हैं। यही तीनों तत्व क्रमश: सत, रज व तम कहलाते हैं। यही प्रकृति के मूल तत्व हैं जिनसे संसार के समस्त विषय बनते हैं। सत गुण को शुक्ल (उजला), रज गुण को रक्त (लाल) व तमोगुण को कृष्ण (काला) कल्पित किया गया है।
सतोगुण का स्वरूप- सत गुण लघु, प्रकाशक और इष्ट (आनंददायक) होता है। ज्ञान में जो विषय प्रकाशकत्व होता है, इन्द्रियों में जो विषय ग्रहिता होती है, वह सब सत्व गुण के कारण होता है। मन, बुद्धि, तेज का प्रकाश, दर्पण या कांच की प्रतिबिम्ब शक्ति आदि सभी सत गुण के कार्य हैं। इसी तरह जहां-जहां लघुता (हल्कापन) के कारण उर्ध्व दिशा में गमन का दृष्टांत मिलता है, जैसे जैसे अग्नि ज्वाला का ऊपर उठना या मन की शांति, वह सब सत गुण के कारण होता है। इसी तरह सभी प्रकार के आनंद जैसे हर्ष, संतोष, तृप्ति, उल्लास आदि और विषय मन में अवस्थित सत गुण के कारण होते हैं।
रजोगुण का स्वरूप- रजोगुण क्रिया का प्रवर्तक होता है। यह स्वयं चल होता है और अन्य वस्तुओं को चलाता है। यह चल होने के साथ-साथ उत्तेजक भी होता है। रजोगुण के कारण हवा बहती है, इंद्रिया विषयों की तरफ दौड़ती हैं और मन चंचल हो उठता है। सत व तम दोनों स्वत: निष्क्रिय होते हैं। वे रजोगुण की सहायता से ही प्रवर्तित होते हैं। रजोगुण दु:खात्मक होता है। जितने प्रकार के दु:खात्मक (शारीरिक या मानसिक कष्ट) होते हैं, वे रजोगुण के कारण होते हैं।
तमोगुण का स्वरूप- तमोगुण गुरु (भारी) और अवरोधक होता है। यह सतगुण का उलटा है। यह प्रकाश का आवरण करता है। यह रजोगुण की क्रिया का भी अवरोध करता है जिसके कारण वस्तुओं की गति नियंत्रित हो जाती है। तत्व जड़ता व निष्क्रियता का प्रतीक है। इसी के कारण बुद्धि, तेज आदि का प्रकाश फीका पड़ने से मूर्खता या अंधकार की उत्पत्ति होती है। यह मोह या अज्ञान का जनक है। यह क्रिया की गति अवरोध करता है, निद्रा, तंद्रा या आलस्य उत्पन्न करता है। यह अवसाद या औदासिन्य का कारण है।
sharadchandra mishra

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