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जैन दर्शन कहता है कि वस्तुओं के संबंध में जो हमारे भिन्न-भिन्न प्रकार के अपरोक्ष या परोक्ष ज्ञान हैं, उनसे स्पष्ट है कि उनके अनेक धर्म हैं। जैन दार्शनिक कहते हैं- ‘अनन्तधर्मकं वस्तु’ केवल ज्ञान के द्वारा वस्तुओं के अनंत धर्मों का ज्ञान अपरोक्ष रूप से होता है, किन्तु साधारण मनुष्य किसी वस्तु को किसी समय एक ही दृष्टि से देख सकता है। वह उस वस्तु का एक ही धर्म जान सकता है। वस्तुओं के इस आंशिक ज्ञान को जैन धर्म ‘दार्शनिक नय’ कहता है। इस ज्ञान के आधार पर जो परामर्श होता उसे भी ‘नय’ कहता है। किसी भी विषय के संबंध में हमारा जो परामर्श होता है वह सभी दृष्टियों से सत्य नहीं होता, उसकी सत्यता उसके ‘नय’ पर निर्भर होती है। अर्थात जिस दृष्टि या जिस विचारधारा से किसी विषय का परामर्श होता है, उसकी सत्यता उसी दृष्टि तथा उसी विचार पर निर्भर करती है। हमारे मतभेद का कारण यह है कि हम उपर्युक्त सिद्धान्त को भूल जाते हैं और अपने विचारों को सर्वथा सत्य मानने लगते हैं। मान लीजिए कुछ अंधे हाथी का आकार जानना चाहते हैं। कोई उसका पैर, कोई कान, कोई पूंछ और कोई उसका सूड़ पकड़ता है। इसका फल यह होता है कि उन अंधों में हाथी के आकार के संबंध में पूरा मतभेद हो जाता है। प्रत्येक अंधा सोचता है कि उसी का ज्ञान ठीक है। जैसे ही उन्हं् विश्वास दिलाया जाता है कि प्रत्येक ने हाथी का एक-एक अंग ही स्पर्श किया है, उनका मतभेद दूर हो जाता है। दार्शनिकों और ज्ञानियों के बीच मतभेद भी इसीलिए होता है कि किसी विषय को भिन्न-भिन्न दृष्टि से वे आंकते हैं। साम्य दृष्टि होने पर मतभेद की संभावना नहीं रह जाती है। भिन्न-भिन्न धर्मों एवं विचारधाराओं मं संसार, जीवन, जगत के संबंध में भिन्न-भिन्न दर्शन पाए गए हैं, इसका कारण यह है कि उनमें एक दृष्टि नहीं है। दृष्टिभेद के कारण उसमें मतभेद पाया जाता है। किन्तु कोई भी विचारधारा यह नहीं सोचती कि उसका मत दृष्टि विशेष पर ही निर्भर करता है। हो सकता है कि अन्य दृष्टि से उसका मत युक्तिसंगत न हो। जो हाथी और अंधे का दृष्टान्त दिया गया है, उसमें प्रत्येक अंधे का ज्ञान अपने ढंग से बिल्कुल ठीक है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न विचारधाराएं अपनी दृष्टि से ठीक हो सकती हैं। इसलिए जैन धर्म प्रत्येक ‘नय’ के आरंभ में ‘स्यात्’ शब्द के प्रयोग की बात करता है। ‘स्यात्’ शब्द से संकेत होता है कि सत्यता प्रसंग विशेष पर निर्भर होता है। अन्य प्रसंगों में वह मिथ्या भी हो सकता है। जैन धर्म का यह मत ‘स्याद्वाद’ कहलाता है। स्याद्वाद का सार अर्थ यह है कि सामान्य मनुष्य किसी विषय में जो परामर्श करता है वह एकदेशीय होता है, अर्थात उस परामर्श की सत्यता उस प्रसंग के अनुसार होती है जिसके साथ उसकी कल्पना हुई थी। स्याद्वाद सिद्धान्त से यह स्पष्ट होता है कि जैनों की दृष्टि बहुत उदारवादी है। ये लोग अन्यान्य विचारधाराओं को नगण्य नहीं समझते हैं, अन्य दृष्टि से उसे भी सत्य मानते हैं और किसी विचारधारा की हठोक्ति को भी नहीं मानते हैं कि केवल उसी के विचार सत्य हैं। जैन धर्म का परामर्श या जजमेंट संबंधी मत संसार को एक अद्भुत व सुन्दर देन है। इसने सभी मतों का समादर किया है और सभी को परम सत्य से दूर रखा है। परम सत्य अचिन्त्य है। सभी कथनीय सत्य सापेक्ष हैं जो काल विशेष से संबंधित हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजादनगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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