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सत, रज व तम इन तीनों गुणों में आपस में विरोध भी है और सहयोग भी। वे सर्वदा एक साथ एक-दूसरे से अविच्छेद्य रहते हैं। उसमें से एक स्वत: बिना किसी दूसरे के सहयोग से कोई कार्य उत्पन्न नहीं कर सकता। जिस प्रकार तेल, बत्ती, आग तीनों के सहयोग से दीपक जलता है, उसी प्रकार तीनों गुणों के सहयोग से ही सांसारिक वस्तुएं उत्पन्न होती हैं। संसार की छोटी-बड़ी, स्थूल-सूक्ष्म सभी वस्तुओं में ये तीनों गुण विद्यमान रहते हैं। इनका प्रत्येक गुण एक -दूसरे को दबाने की कोशिश करता है। जो गुण अधिक प्रबल होता है उसके अनुसार वस्तु का स्वरूप निर्धारित होता है। शेष दो गुण उस वस्तु में गौण रूप में विद्यमान रहते हैं। संसार में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसमें न्यूनाधिक परिमाप में इन तीनों तत्वों सम्मिश्रण न हो। इन्हीं गुणों के अनुसार विषयों का विभाग तीन वर्गों में किया जाता है- इष्ट, अनिष्ट व तटस्थ।


तीनों गुण निरंतर परिवर्तनशील हैं। विकार या परिणाम उनका स्वभाव है। इसलिए एक क्षण भी अविकृत रूप में नहीं रहते हैं। गुणों में दो तरह के परिणाम होते हैं। प्रलयावस्था में प्रत्येक दूसरों से खिंचकर स्वत: अपने में परिणत होता है। यह अवस्था सरूप परिणाम कहलाता है। इस अवस्था में गुणों से कोई कार्य उत्पन्न नहीं होता है। सृष्टि के पूर्व तीनों गुण साम्यावस्था में रहते हैं अर्थात वे अस्फुटित रूप से अव्यक्त पिंडरूप में रहते हैं, जिसमें न रूपांतर है, न शब्द, स्पर्श, रूप, रस या गंध होता है और न कोई विषय होता है। यही साम्यावस्था सांख्य की ‘प्रकृति’ है। दूसरे प्रकार का परिणाम तब उत्पन्न होता है जब गुणों में से एक प्रबल हो उठता है और शेष दो उसके अधीन हो जाते हैं। जब ऐसा होता है तभी विषयों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार का परिणाम विरूप परिणाम कहलाता है। इससे सृष्टि का प्रारंभ होता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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