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इस वर्ष प्रयाग में 10 फरवरी को लगेगा
कुम्भ महापर्व विश्व का सबसे बड़ा मेला है। यह भारत की प्राचीन गौरवरूपी वैदिक संस्कृति व सभ्‍यता का प्रतीक है। इस महापर्व के अवसर पर देश-विदेश से लोग आते हैं और स्नान, दान कर पुण्य अर्जित करते हैं। कुम्भ पर्व के संबंध में वेद, पुराणों में अनेक मंत्र व प्रसंग मिलते हैं जिनसे सिद्ध होता है कि यह पर्व अत्यंत प्राचीन समय से चला आ रहा है। ऋग्वेद के दशम मंडल के अनुसार कुम्भ पर्व में जाने व वाला मनुष्य स्वयं स्नान, दान व होमादिक कार्मों से अपने पापों को उसी तरह नष्ट करता है जैसे कुल्हाड़ी वन को काट देती है। जिस प्रकार नदी अपने तटों को काटती हुई प्रवाहित होती है उसी प्रकार कुम्भ पर्व मनुष्य के संचित कर्मों से प्राप्त हुए मानसिक और शारीरिक पापों को नष्ट करता है और नूतन घड़े की तरह निज स्वरूप को नष्ट कर नवीन सुवृष्टि प्रदान करता है।
कालचक्र में सूर्य, चंद्रमा एवं देवगुरु वृहस्पति का महत्वपूर्ण स्थान है। इन तीनों ग्रहों का योग ही कुम्भ पर्व का आधार है। प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक सभी तीर्थों पर हर 12 वर्षों के पश्चात सूर्य, चंद्र व वृहस्पति इन तीनों का विशेष योग बनने पर कुम्भ महापर्व का समागम होता है। माघ मास की अमावस्या पर जब सूर्य और चंद्रमा मकर राशि पर तथा वृहस्पति वृष राशि स्थित हों तो उस समय प्रयाग में कुम्भ महापर्व का योग बनता है। स्कंद पुराण में वर्णित है- मकरे च दिवानाथे वृषभे च वृहस्पतौ कुम्भ योगो भवेत तत्र प्रयागे हि अतिदुर्लभे। विक्रम संवत् 2069 अर्थात 10 फरवरी 2013 के दिन रविवार को माघ मास मौनी अमावस को सूर्य और चंद्रमा मकर राशि पर इकट्ठे होंगे तथा गुरु के वृष राशि में संचार होने से प्रयागराज में त्रिवेणी के तट पर कुम्भ महापर्व का आयोजन होगा। त्रिवेणी पर मुख्य स्नान, जप, पाठ, दानादि का विशेष पुण्यकाल सूर्योदय से 4 घटी पूर्व प्रात: 5 बजकर 5 मिनट से प्रारंभ होकर दोपहर 12 बजकर 42 मिनट तक रहेगा।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

keyword: kumbh, hindu
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