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संस्कृत ग्रंथ ‘अमरकोश’ के अनुसार ‘कुम्भे घटेभ मूर्धाशौ’ कुम्भ घड़ा, हाथी का गण्डस्थल, एक राशिपति का ग्यारहवां भाग, इन तीन अर्थों में प्रयुक्त होता है। समुद्र मंथनजन्य अमृत कुम्भ से सम्बद्ध होने के कारण कुम्भ शब्द उपचारेण एक विशेष अर्थ ‘कुम्भ पर्व’ अर्थ में प्रयुक्त होता है। कुम्भ शब्द की व्युत्पत्ति छह प्रकार से की गई है। 1- ‘कुं पृथ्वीं उम्भयति पुरयाति मंगलेन ज्ञानामृतेन वा’ अर्थात जो समस्त पृथ्वी को मंगल ज्ञान से पूर्ण कर दे। 2- ‘कुत्सित उम्भति:’ अर्थात जो पर्व संसार के अरिष्ट और पापों को दूर कर दे। 3- ‘कु: पृथ्वी उम्यते अनुगृह्यते आच्छाद्यते आनन्देन पुण्येन वा’ अर्थात जिस पर्व के द्वारा पृथ्वी को आनंद व पुण्य से ढक दिया जाय। 4- ‘कु: पृथ्वी उम्यते लह्वी क्रियते पाप प्रक्षालनेन येन’ अर्थात पृथ्वी पर पापों को धोकर जब उसे हल्का बना दिया ऐसा पर्व कुम्भ । 5- ‘कु: पृथ्वी भावयति दीपयति’ अर्थात जो पर्व पृथ्वी को सुशोभित कर दे, दीप्त कर दे, उसके तेज को बढ़ा दे। 6- ‘कुं सुखं ब्रह्म तद उम्भति प्रयच्छतीति कुम्भ:’ अर्थात सुख स्वरूप परम ब्रह्म के अनुभव को प्रदान करने वाले संत समागम का नाम कुम्भ है।
कुम्भ शब्द का उल्लेख वेदों में आता है। ऋग्वेद के दशम मंडल एवं यजुर्वेद व अथर्ववेद में कुम्भ शब्द समस्त संसारवासियों के लिए शुभ कर्मों के अनुष्ठान हेतु आता है। ‘पूर्ण: कुम्भेऽधिकाल आग्हिस्तं वै पश्यामो बहुधा नु संत:। सह इमा विश्वाभवनानि प्रत्यंकाले तमाहु परमेश व्योमन्’ अथर्ववेद में ब्रह्माजी का कथन है- हे पृथ्वी! मैं तुम्हें दूध, दही और जल से पूर्ण चार कुम्भों को चार स्थान पर देता हूं। ‘चतुर: कुम्भय चतुर्था ददामि क्षीरेण पूर्णाम उद्केनदध्ना’ पुराणों के अनुसार पहले चाक्षुष मनवंतर में देव दानवों ने भगवान विष्णु की सहायता से समुद्र मंथन किया। स्कंद पुराण के अनुसार समुद्र मंथन से कालकूट विष के अतिरिक्त तेरह रत्न प्रकट हुए जिसमें से एक अमृत कलश भी था। अन्य पुराणों के अनुसार जब देवगुरु वृहस्पति के संकेत से इन्द्रपुत्र जयंत अथवा कल्पभेद से गरुण जो उस समय कुम्भ को लेकर भागे, उस समय समस्त देव-दानव उनका पीछा किए। उनमें परस्पर 12 दिन (देवताओं का दिन) तक संघर्ष चलता रहा। उस समय सुरक्षा की दृष्टि से कुम्भ को 12 स्थानों पर रखा गया जिसमें से 8 स्वर्ग के थे तथा चार स्थान पृथ्वी के थे। पृथ्वी के चारो स्थान हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन व नासिक हैं। चंद्रमा ने कुम्भ को ढरकने से, सूर्य ने टूटने से, गुरु ने दैत्यों की छीना-झपटी से तथा शनि ने इन्द्र के भय से रक्षा की। जैसा कि कहा गया है- ‘पृथिव्यां कुम्भ योगस्य चतुर्थाभेद उच्यते। चतु:स्थले निपनात् सुधा कुम्भस्य भूतले।। इन्द्र:प्रस्रवगात् रक्षां सूर्यो विस्फोटनात् रधौ। दैत्येभ्‍यश्च गुरु रक्षां सौरि: देवेन्द्रजात् भयात।।’
देवताओं का एक दिन मानवों का एक वर्ष है। अत: प्रत्येक 12 वर्ष पश्चात कुम्भ पर्व हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन एवं नासिक में होता है। ज्योतिष के अनुसार गुरु प्राय: एक वर्ष में एक राशि का भोग करता है। कुम्भ राशि के गुरु में हरिद्वार, वृष राशि के गुरु में प्रयाग, सिंह राशि के गुरु में उज्जैन तथा तुला राशि के गुरु में नासिक में कुम्भ पर्व होता है। सूर्य प्राय: एक महीने में एक राशि का भोग करता है। जब सूर्य मेष राशि का हो तो हरिद्वार में मुख्य स्नान, मकर का हो तो प्रयाग में, मेष का हो तो उज्जैन में तथा सिंह राशि का होने पर नासिक में प्रमुख स्नान होता है। सूर्य के साथ चंद्र की स्थिति भी कुम्भ पर्व के लिए आवश्यक है। चंद्र सूर्य की मेष संक्रांति तथा अमावस्या तिथि में होने पर हरिद्वार का पुण्यकाल, माघ अमावस्या तिथि के चंद्रमा में प्रयाग का पुण्यकाल, स्वाती नक्षत्र का योग तुला के चंद्रमा में उज्जैन तथा सिंह के चंद्रमा में नासिक का पुण्य काल आता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र
430 बी, आजाद नगर, रूस्‍तमपुर,गाेरखपुर

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