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पौष मास की पूर्णिमा से माघ मास की पूर्णिमा तक माघ मास का स्नान किया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार माघ मास में शीतल जल में डुबकी लगाने से मनुष्य पापमुक्त हो स्वर्ग चले जाते हैं। माघ मास के स्नान का सर्वाधिक महत्व तीर्थराज प्रयाग में है। महाभारत के अनुसार माघ मास की अमावस्या (मौनी अमावस्या) को प्रयागराज में 3 करोड़ 10 हजार तीर्थों का समागम होता है। इस वर्ष मौनी अमावस्या 10 फरवरी को पड़ रही है।
प्रयाग के अलावा काशी, नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा अन्य पवित्र तीर्थों एवं नदियों में भी स्नान का बड़ा महत्व है। यह स्नान सूर्योदय से पूर्व किया जाता है। पद्मपुराण के अनुसार माघ मास में व्रत, दान, तपस्या से भगवान विष्णु को उतनी प्रसन्नता नहीं होती जितनी माघ मास के स्नान से। इसलिए स्वर्ग लाभ, सभी पापों से मुक्ति तथा भगवान


वासुदेव की प्राप्ति के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान करना चाहिए। यदि संपूर्ण मास में स्नान न कर सकें तो तीन दिन अथवा एक दिन माघ स्नान व्रत करना चाहिए। निर्णय सिंधु में कहा गया है- ‘मास पर्यन्त स्नानासम्भवे तु त्र्यहमेकाहं वा स्नायात।’ जो मनुष्य चिरकाल तक स्वर्ग लोक रहना चाहते हैं, उन्हें माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर अवश्य तीर्थ स्नान करना चाहिए- ‘स्वर्गलोके चिरवासौ येषां मनसि वर्तते। यत्र ववापि जले तैस्तु स्नातव्यं मृगभाष्करे।।’ माघ मास में स्नान का संकल्प पौष पूर्णिमा को प्रात:काल लेना चाहिए। नियमित स्नान के उपरांत हरिकथा का श्रवण करना चाहिए। संपूर्ण माघ मास एक वक्त आहार लेना चाहिए। महाभारत में कहा गया है कि जो माघ मास में नियम पूर्वक केवल एक समय ही भोजन करता है वह अगले जन्म में धनवान कुल में जन्म लेकर अपने कुटुम्बी जनों में महत्व को प्राप्त करता है।
माघ मास में दान का भी विशेष महत्व है। दान में तिल, कंबल से विशेष पुण्य होता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि जो माघ मास में ब्राह्मणों और निर्धनों को तिल का दान करता है वह समस्त जन्तुओं से भरे हुए घोर नरक का दर्शन नहीं करता। माघ मास में पूर्णिमा पर ब्रह्मवैवर्त पुराण का दान करना चाहिए। मत्स्य पुराण का कथन है कि माघ की पूर्णिमा पर जो ब्रह्मवैवर्त पुराण का दान करता है उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।
व्रत कथा- प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर शुभव्रत नामक एक ब्राह्मण निवास करते थे। वे समस्त वेद-वेदांगों व धर्मशास्त्रों के ज्ञाता थे। साथ ही उन्हें अनेक देशों की भाषाओं और लिपियों का भी ज्ञान था परन्तु वे लालची थे। उन्होंने अपने जीवन में केवल धन कमाने का ही लक्ष्य रखा था। सभी प्रकार से उन्होंने धन कमाया। धनोपार्जन में ही उन्हें वृद्धावस्था ने आ घेरा। उन्हें कई प्रकार के रोग हो गए, तब उन्हें सद्ज्ञान की प्राप्ति हुई। उन्होंने विचार किया कि सारा जीवन धन कमाने में नष्ट कर दिया, अपना परलोक सुधारने के लिए कभी भी ध्यान नहीं दिया, अब मेरा उद्धार कैसे होगा, मैंने तो आजन्म कोई सत्कर्म किया ही नहीं। उसी व्याकुल चित्त में उन्हें एक श्लोक याद आया जिसमें माघ मास में स्नान का महत्व बताया गया था। शुभव्रत ने उसी श्लोक के अनुरूप माघ मास स्नान का संकल्प लिया और नर्मदा में स्नान करने लगे। इस प्रकार नौ दिन तक प्रात: नर्मदा के जल में स्नान करते। दसवें दिन स्नान के पश्चात उनकी तबीयत बिगड़ी और परलोक जाने का समय आ गया। यद्यपि उन्होंने जीवन भर कोई सद्कर्म नहीं किया था, पापपूर्वक धनार्जन किया था परन्तु माघ मास में स्नान करके पश्चातापपूर्वक निर्मल मन होकर प्राण त्याग किया तो उनके लिए दिव्य विमान आया और उस पर आरूढ़ होकर वह स्वर्गलोक चले गए।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र
430 बी आजादनगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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