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माघ मकरगत रबि जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई।। गोस्वामी जी की यह पंक्ति बताती है कि पौष मास में सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश से धनु (खर) मास समाप्त हो जाता है। इससे मांगलिक कार्यों पर लगा मास व्यापी प्रतिबंध समाप्त हो जाता है। यही पावन समय मकर संक्रांति कहलाता है। यह मुख्य रूप से सूर्योपासना का पर्व है। इस दिन देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर भारी भीड़ स्नान के साथ दान पुण्य करने के लिये जुटती है। हिन्दू धर्म में मकर संक्रांति के पुण्यकाल में स्नान-दान, जप-होम, आदि शुभ कार्यों के लिये बहुत ही अच्छा समय माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस संक्रांति के पुण्यकाल में किया गया दान-दाता को सौगुना होकर प्राप्त होता है। सूर्य भगवान इस दिन दक्षिणायण से उत्तपरायण होकर विशेष फलदायक हो जाते है। शास्त्रों में उत्‍तारायण की अवधि को देवताओं का दिन बताया गया है। इस दृष्टि से मकर संक्रांति देवताओं का प्रभातकाल सिद्ध होता है। उत्त्र भारत में यह पर्व खिचड़ी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। जबकि दक्षिण भारत में पोंगल, पं0 बंगाल में तिलुवा संक्रांति और पंजाब में लोहिड़ी के रूप में मनाने की प्रथा है।
इसी कड़ी में शामिल है गोरखपुर में स्थित विश्व प्रसिद्ध बाबा गुरू गोरखनाथ मंदिर। गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति में लगता है खिचड़ी मेला। यह मेला एक महीने तक चलता है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष 14 जनवरी को पड़ने वाले मकर संक्रांति के पावन पर्व पर बाबा गुरू गोरक्षनाथ जी के मंदिर में देश और विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में है। हिन्दुओं के लिये शुभ कार्यों के शुभारंभ के लिये बहुत ही अच्छा समय माना जाता है। बाबा गुरू गोरक्षनाथ जी शिव के अवतार थे। ऐसी मान्यता है कि गुरू गोरक्षनाथ जी एक बार हिमांचल के कांगड़ा नामक क्षेत्र में घूमते हुए जा रहे थे। ज्वाला देवी के धाम को देखते हुए वह उधर से गुजर रहे थे, तो गुरू गोरक्षनाथ जी को आया हुआ देखकर ज्वाला देवी प्र्रकट होती है और धाम में आतिथ्य स्वीकार करने का आग्रह करती हैं। चूंकि साख्य परंपरा का पीठ होने के नाते वहां पर मद्य-मांस का भोग लगता था। गोरक्षनाथ जी योगी थे। लेकिन मां ज्वाला देवी के आग्रह को नकार नहीं सकते थे।
उन्होंने मां से आग्रह किया कि मां मैं तो मधुकरी (भिक्षा) में जो कुछ प्राप्त होता है उसी का सेवन करता हूं। मां ज्वाला देवी ने गुरू गोरक्षनाथ जी से कहा आप मधुकरी (भिक्षा) मांगकर अन्न ले आइये मैं चूल्हा जलाकर जल गरम करती हूं। देवी ने पात्र में जल भर चूल्हे पर चढ़ा दिया, जो आज भी जल रहा है, लेकिन गोरक्षनाथ जी उस स्थान पर लौटकर नहीं पहुंचे। वे भ्रमण करते हुए यहां वर्तमान गोरखपुर आ पहुंचे। त्रेता युग में यह क्षेत्र वन से घिरा हुआ था। गोरक्षनाथ जी को वनाच्छादित यह क्षेत्र तप करने के लिये अच्छा लगा और वह यही तप करने लगे। भक्तों ने गुरू गोरक्षनाथजी के लिये एक कुटिया बना दी। उन्होंने गोरक्षनाथ जी के चमत्कारी खप्पर (भिक्षा मांगने का पात्र) में खिचड़ी भरना प्रारंभ कर दिया। यह मकरसंक्रांति की तिथि थी। यह खप्पर आज तक भरा नहीं। तभी से प्रतिवर्ष गोरक्षनाथ मंदिर में खिचड़ी का महापर्व मनाया जाता है। उसी समय से गोरक्षनाथ मंदिर में खिच़ड़ी के अवसर पर बहुत बड़ा मेला लगता है। जो प्रायः एक माह तक चलता है। मकर संक्रांति की भोर में तीन बजे मुख्य मंदिर के पट खोल दिये जाते हैं। इसके बाद योगी आदित्यनाथ व मंदिर के अन्य पुजारियों द्वारा की गयी आरती व खिचड़ी चढ़ायी जाती है। इसी के साथ श्रद्धालुओं द्वारा भी खिचड़ी चढ़ाने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
ऐसी भी मान्यता है कि शास्त्रीय दृष्टि से वृहस्पति देवताओं के गुरू हैं, जिनका रंग पीत यानी पीला है। धार्मिक अनुष्ठान आदि हर एक शुभ कार्य में पीला रंग स्वीकार्य है। वृहस्पति के उत्त रायण काल का आचार्य होने के नाते मकर संक्रांति के दिन पीली वस्तुओं एवं खिचड़ी के प्रयोग को शुभ माना जाता है। देवताओं को खिचड़ी चढ़ाने और साधु-संतों-ब्राह्मणों में दान करने से लेकर खाने तक। गोरक्षनाथ मंदिर के भीतर गोरक्षनाथ जी द्वारा जलायी गयी अखण्ड ज्योति त्रेतायुग से आज तक अनेक झंझावातों एवं प्रलयकारी आपत्तियों के थपेड़े खाकर भी अनवरत जल रही है। यह ज्योति आध्यात्मिक ज्ञान, अखण्डता तथा एकान्तता की प्रतीक है। गुरू गोरक्षनाथ जी द्वारा ही त्रेता युग में प्रज्वलित धूना भी आज तक निरंतर जल रहा है।
मंदिर प्रांगण के अंदर अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी स्थित है। नाथ संप्रदाय के सभी ब्रह्मलीन संतों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे आज भी वह सैकड़ों वर्षों से तप कर रहे हैं। इसके अलावा त्रेता युग में बना सरोवर भी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता है। जहां एक तरफ आस्था से ओत-पोत श्रद्धालु बाबा गुरू गोरक्षनाथ जी को खिचड़ी चढ़ाने आते हैं। वहीं खिचड़ी पर नेपाल से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी हजारों में है। वहीं एक माह तक लगने वाले मेले का भी सभी आनंद लेते है। तरह-तरह के झूलों, मनोरंजन करते कलाकार यहां आने वाले बच्चों, बूढ़ों और जवान सभी को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते है। पहली बार मेले में बनाया गया मां वैष्णों देवी का प्रतीकात्मक मंदिर लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। मेले में बिकने वाली खाजा/खजला मिठाई भी काफी प्रसिद्ध है।
नीरज श्रीवास्तलव

keyword: makar sansankranti

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  1. Gajadhar Dwivedi jee first of all i will seize this opportunity to thank you for promoting my post and thus guiding me to ur page. i feel fortunate to have visited you and although virtually i am satisfied.
    For quite sometime now i have been seeking some answers regarding Makar Sankranti. From where i hail from my own Bihar it is called Tilasankranti. i wanted to know about why of all the grains Til ie sesame seeds have been given so much importance. i know of it's health benefits during winters and otherwise. What i wanted to know more is whether it has any mythological story behind. Can u help me out in this. i shall be much obliged. Thank u once again. Will be visiting more of ur posts.:)

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