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आस्था थी। श्रद्धा थी। लाखों श्रद्धालुओं की। सूरज की किरण अभी धरती पर उतरी नहीं थी लेकिन श्रद्धालुुओं की आस्था से गुरु गोरक्षनाथ मंदिर दमक रहा था। बाबा थे और श्रद्धालु। दोनों के बीच में कोई तीसरा नहीं था। न जाति थी, न संप्रदाय थे और न ही था ऊंच-नीच का भेद-भाव। न कोई विशिष्ट था, न कोई अशिष्ट था। सब बाबा के भक्त थे। वे सिर्फ गोरखपुर या पूर्वी उत्तर प्रदेश के ही नहीं थे, न जाने कहां-कहां से आस्था उन्हें खींच लाई थी। सब बाबा के दरबार में आकर प्रसन्न थे। किसी की मनोकामना पूरी हुई थी तो कोई मनौती मानने आया था। इस उम्मीद में कि उसकी भी मुरादें पूरी होंगी, उसने बाबा को खिचड़ी चढ़ाई। मत्था टेका। मंगल कामना की। पूरा मंदिर परिसर और उसके आसपास के रास्ते श्रद्धालुओं से खचाखच भरे थे। सुबह से लेकर देर शाम तक लाखों लोगों ने बाबा को अपनी आस्था व श्रद्धा निवेदित की। पूर्वी उत्तर प्रदेश के अलावा दिल्ली, बिहार, छत्तिसगढ़, राजस्थान व नेपाल से भारी संख्या में श्रद्धालु आए थे।
सुबह के तीन बजे थे। अभी रात ही थी लेकिन रोशनी से पूरा गोरक्षनाथ मंदिर जगमगा रहा था। मंदिर के कपाट खुले। घंटा-घड़ियाल की ध्वनि गूंजी। गोरक्षपीठ उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ ने महायोगी गुरु गोरक्षनाथ को मत्था टेका। जयघोष गूंज उठा। विधि-विधान से उन्होंने सबसे पहले बाबा को खिचड़ी चढ़ाई। इसके बाद आम श्रद्धालुओं द्वारा शुरू हुआ खिचड़ी चढ़ाने का सिलसिला देर शाम तक चलता रहा। अनवरत जयघोष गूंज रहा था। आस्था का संगम लहरा रहा था। भक्ति की मंदाकिनी प्रवाहित हो रही थी और उसमें अवगाहन कर रहे थे देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु। भीषण ठंड के बीच श्रद्धालु अपनी आस्था की गर्मी लिए लाइन में खड़े थे। इसी बीच सूरज का लाल गोला पूरब में दिखा और पूरे मंदिर पर लालिमा छा गई। श्रद्धालुओं में उत्साह का संचार हुआ और एक बार फिर गूंजा गुरु गोरक्षनाथ बाबा का जयघोष।
खिचड़ी चढ़ाने वाले श्रद्धालुओं की लाइन गोरखनाथ पुल के ऊपर तक लगी थी। वह भी कई पंक्तियों में। मंदिर के मुख्य द्वार से मंदिर तक महिला-पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग मार्ग बनाए गए थे, उनमें भी कई पंक्तियां थीं। पूरे मार्ग में स्वयंसेवक रस्सी व बांस से थोड़ी-थोड़ी दूर पर बाक्स बना दिए थे। एक बाक्स में लगभग पचास श्रद्धालु आते थे। एक बार एक बाक्स के श्रद्धालु छोड़े जाते थे। उनका समूह जब ठीक गर्भ गृह के सामने पहुंच जाता था तो पुन: बाक्स खुलता था और श्रद्धालु आगे बढ़ते थे। इस वजह से किसी श्रद्धालु को कोई दिक्तत नहीं हुई। सभी ने बारी-बारी से अपनी आस्था बाबा के चरणों में निवेदित की।

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