0
मकर संक्रांति एक ऋतु पर्व है, यह दो ऋतुओं के संधिकाल का द्योतक है। एक ऋतु की विदाई का तो दूसरे के आगमन का संकेत है। यह शीत ऋतु की समाप्ति तो वसंत ऋतु के आगमन की सूचना देता है। शीत ऋतु होने के कारण इस दिन खिचड़ी, तिल, गुड़ आदि का सेवन किया जाता है। यह सूर्य के अर्थात गर्म दिनों के आने का प्रतीक पर्व है।
मकर संक्रांति के दिन स्नान-दान का अति महत्व है। शातातप ने कहा है- ‘संक्रान्तौ यानि दत्तानि हव्यकव्यानि दातृभि:। तानि नित्यं ददात्यर्क: पुनर्जन्मनि जन्मनि।।’ अर्थात संक्रांति आदि के अवसरों में हव्य, कव्यादि जो कुछ भी दिया जाता है, सूर्य नारायण उसे जन्म-जन्मांतर प्रदान करते रहते हैं। महर्षि वशिष्ठ ने तो अयन के संक्रांति पर दिए गए दान का करोड़ गुना फल कहा है- ‘अयने कोटिपुण्यं च लक्षं विष्णुपदी फलम्। षडशीति सहस्रं च षडशीत्यां स्मृतं बुधै:।।’ इस पर्व पर उपवास रखने का विधान नहीं है। इस ऋतु के अनुकूल वस्तुओं, पदार्थों के दान का विधान है। इस दिन तिल, गुड़, खिचड़ी, मिष्ठान, बर्तन, कपास, ऊनी वस्त्र आदि वस्तुओं के दान का विधान है। पद्मपुराण के अनुसार इस दिन दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान सूर्य को लाल वस्त्र, गेहूं, गुड़, मसूर दाल, तांबा, स्वर्ण, सुपाड़ी, लाल फल, लाल फूल, नारियल व दक्षिणा इत्यादि प्रदान किया जाता है। मकर संक्रांति पर्व पर कटु वचन बोलना, पेड़-पौधे तोड़ना या काटना, पशु को पीड़ा देना व मांस खाना इत्यादि वर्जित माना गया है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

keyword: makar sankranti
नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top