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परमहंस योगानंद का जन्म 5 जनवरी 1893 को गोरखपुर के मोहल्ला मुफ्तीपुर थाना कोतवाली के पश्चिम स्थित शेख अब्दुल रहीम उर्फ अच्छन बाबू की मकान में हुआ था। उनके पिता भगवती चरण घोष तब बंगाल-नागपुर रेलवे के कर्मचारी थे। सर्वव्यापी प्रेम और मानवता की सेवा का लक्ष्य धारण कर जीवन भर विश्व कल्याण में लगे परमहंस योगानंद ने छह महाद्वीपों में सैकड़ों केन्द्रों के माध्यम से योग की अद्भुत शिक्षा के द्वारा लाखों शिष्यों के जीवन में नई ऊर्जा भरी। शिष्यों के भीतर चमत्कारिक शक्ति का प्रवाह करने वाले इस संत ने संसार को आध्यात्मिक अनुभवों का जो रसपान कराया, उसे विलक्षण तपोबल का अमृत फल ही कहा जा सकता है। ‘सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप’ आत्म अनुभूति की अंतर्राष्ट्रीय और सार्वभौमिक व्यवस्था से लाखों लोगों को परमानंद की ओर ले गए। देश के इस सुपत्र ने उच्च आध्यात्मिक प्रशिक्षण को भूमंडल पर शांति ध्वज के रूप में स्थापित किया।
योगानंद ने कलकत्ता के स्काटिश चर्च कालेज और श्रीरामपुर कालेज में अध्ययन किया। 1915 में बीए की उपाधि प्राप्त की। जन्म से सत्य के जिज्ञासु योगानंद अपने गुरु युक्तेश्वर गिरी जो लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे, से मिले और दीक्षा दी। योगानंद युवाओं की शिक्षा के प्रति गहरी रुचि रखते थे। उन्होंने 1917 में 7 छात्रों के साथ बंगाल के दिहिका में पहला स्कूल स्थापित किया। कासिम बाजार के महाराजा सर मानिन्द्रचंद्र नंदी ने उनसे प्रभावित होकर रांची में 25 एकड़ भूमि विद्यालय हेतु अर्पित की, बाद में जिसका नाम योगानंद सत्संग विद्यालय पड़ा। महात्मा गांधी सहित अनेक विभूतियों ने इस विद्यालय का सानिध्य प्राप्त किया। 1920 में योगानंद ने पश्चिम में अपना मिशन प्रारंभ किया। बोस्टन में 4 अक्टूबर को ‘धर्म के विज्ञान’ विषय पर व्याख्यान दिया तथा ‘धार्मिक स्वतंत्रता में अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस’ में भारत का प्रतिनिधित्व किया। फिर तो संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयार्क, वाशिंगटन, मियामी, शिकागो, डेट्राइट, इंडियनपोलिस, फिलाडेल्फिया, पिट्सबर्ग, क्लेवलैंड, सैनफ्रांसिसको, लाएंजेल्स, बोस्टन आदि विभिन्न शहरों में घूम-घूमकर योग विज्ञान पर व्याख्यान दिए। उन्होंने परमात्मा तक पहुंचने के लिए योग की तकनीकियों को सिखाया। उन्होंने ‘ द साइंस आफ रिलीजन’, ‘साइंटिफिक हीलिंग’, ‘अफरमेशंस कास्मिक चाट्स ए मेटाफिजिकल मेडीटेशंस’ व ‘आटोबायोग्राफी आॅफ ए योगी’ सहित कई ग्रंथ लिखे। कैलीफोर्निया में 23 एकड़ सुन्दर भूमि पर 1937 में उन्होंने सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप आश्रम केन्द्र की स्थापना की। फिर सर्वधर्म स्व अनुभूति मंदिर 1942 में हालीवुड में भी बनाया। 1950 में कैलीफोर्निया में महात्मा गांधी विश्वशांति स्मारक जनता को समर्पित किया। अमेरिका में भारत के तत्कालीन राजदूत विनय आर. सेन के सम्मान में 7 मार्च 1952 को आयोजित समारोह में व्याख्यान देने के बाद वह महासमाधि में लीन हो गए।
शेख अब्दुल रहीम उर्फ अच्छन बाबू

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