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पृथ्वी पर पश्चिम से पूर्व की ओर समानांतर रेखाएं खिंची हुई हैं जो काल्पनिक हैं। इनको अक्षांश कहते हैं। अक्षांश रेखाएं पृथ्वी के केन्द्र के समान कोणीय दूरी पर खिंची हुई मानी जाती हैं। प्रत्येक अक्षांश रेखा अपने आप में एक वृत्त है। इस प्रकार 90 रेखाएं भूमध्य रेखा के उत्तर की ओर तथा 90 रेखाएं भूमध्य रेखा से दक्षिण की ओर खिंची रहती हैं। भूमध्य रेखा पर पृथ्वी दो भागों में विभाजित होती है- उत्तरी गोलार्द्ध तथा दक्षिणी गोलार्द्ध। यहां पर भूमध्य रेखा को 0 अंश माना जाता है। इसे विषुवत रेखा कहते हैं। भूमध्य रेखा के निकटतम अक्षांश पर एक बड़ा वृत्त होता है जो उत्तर की ओर छोटे-छोटे वृत्तों में बदल जाता है। वास्तव में पृथ्वी ठीक वैसी खड़ी नहीं है जैसे नक्शे में दिखाया जाता है। यह साढ़े 33 अंश नीचे की ओर झुकी होने से 23 अंश 26 कला उत्तर तथा 23 अंश 26 कला दक्षिण एक अन्य महत्वपूर्ण रेखा को जन्म देती है। ये सूर्य के लम्बवत चमकने (क्रांतिवृत्त) की उत्तरी तथा दक्षिणी रेखाएं हैं। उत्तरी लम्बवत के भाग को कर्क रेखा तथा दक्षिणी लम्बवत के भाग को मकर रेखा कहा जाता है। प्रति छह मास सूर्य कर्क रेखा से दक्षिण की ओर पूर्वाभिमुख रहता है, इसे दक्षिणायन कहते हैं। यह समय 15 जुलाई से 13 जनवरी के मध्य रहता है। शेष छह मास उत्तरी गोलार्द्ध की ओर पूर्वाभिमुख रहता है, यह समय 14 जनवरी से 14 जुलाई के मध्य आता है, इसे उत्तरायण कहते हैं।

आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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