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आधुनिक विचारधारा पर ग्रीक दर्शन के अध्ययन का पूर्ण प्रभाव है। पाश्चात्य दर्शन के सभी महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का सूत्रपात ग्रीक दर्शन में हो गया था। ग्रीक दर्शन के अध्ययन का यूरोप को धार्मिक अंधविश्वासों से मुक्त कराने में विशेष योगदान है। सभ्‍यता, संस्कृति और दर्शन का ग्रीस में प्रादुर्भाव होना अनेक विद्वानों के आश्चर्य का विषय रहा है। प्राय: विद्वानों की यही मान्यता है कि ग्रीस का अपना स्वतंत्र विकास है और इस पर किसी बाह्य का प्रभाव नहीं पड़ा। किन्तु बीसवीं सदी के अनेक अन्वेषकों से यह सिद्ध हो गया कि प्राचीन ग्रीस (यूनान) पर मिश्र और बेबीलोनिया का प्रभाव नि:संदेह पड़ा है और भारतीय विचारधारा भी ईरान, मिश्र और बेबीलोनिया होती हुई ग्रीस के उपनिवेशों में और उपनिवेशों से ग्रीस में पहुंची। ग्रीक दर्शन का सबसे प्राचीन मत माइलेशियन मत है जिसके तीन प्रतिनिधि हैं- थेलीज, एनेक्जिमेंडर और एनेक्जिमेनीज। थेलीज पाश्चात्य दर्शन के सर्वप्रथम दार्शनिक हैं। इनकी गणना ग्रीस के सप्तर्षियों में होती है। इन्होंने मिश्र की रेखागणित प्रणाली का सर्वप्रथम प्रचार किया। इनका समय ईसा से पूर्व छठीं शताब्दी है। क्योंकि इन्होंने 585 ईसा पूर्व में होने वाले सूर्यग्रहण की भविष्यवाणी की थी। थेलीज के अनुसार विश्व का परमतत्व जल है। जल से ही सृष्टि की उत्पत्ति होती है और जल के ऊपर ही इसकी स्थिति है, जल में ही इसका प्रलय है, जल बिन्दु रूप में सबका जनक है। जल गति और परिणाम का सूचक है और उस परिणाम का आधारभूत तत्व भी है। जल तरल है किन्तु उड़ने वाली भाप के रूप में और घन, बर्फ के रूप में भी बदलता है। जल जीवन व पोषण के लिए आवश्यक है।
एनिक्जिमेंडर- ये थेलीज के शिष्य थे। इनकी कृति ‘प्रकृति पर निबंध’ यूरोपीय दर्शन की प्रथम रचना है। इसके कुछ ही अंश प्राप्त हैं। एनेक्जिमेंडर के अनुसार जल या अन्य किसी भौतिक द्रव्य को परम तत्व नहीं माना जा सकता। परम तत्व अनंत होना चाहिए। चारो भौतिक द्रव्य- पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु शांत हैं। इनमें परस्पर संघर्ष है। यदि इनमें कोई द्रव्य महाभूत अनंत होता तो अन्य महाभूतों की सत्ता नहीं रहती। परम तत्व इन चारो महाभूतों से भिन्न और इनका भी जनक होना चाहिए। परम तत्व को इन्होंने केवल असीम कह कर पुकारा है। यह अनंत, नित्य, स्वयंभू, अविनाशी और अपरिणामी है। इस परम तत्व में सब भूतों की उत्पत्ति होती है और इसी में इसकी स्थिति है, इसी में इसका लय है। स्वयं अपरिणामी और अगतिशील होने पर भी यह परम तत्व संसार की गति, परिणाम, विरोधी और संघर्ष का जनक है। सांसारिक पदार्थों में विरोध या संघर्ष होना अनिवार्य है क्योंकि उसी से इसका विकास होता है। इन विचारों का प्रभाव परवर्ती विद्वान हेगल पर पड़ा। एनेक्जिमेंडर विकासवाद के जनक हैं। उनके अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति का वास्तविक अर्थ उसका विकास है। मछली इत्यादि जल-जन्तुओं के से पक्षी और पशुओं के द्वारा क्रमश: मनुष्य का विकास हुआ। इन्होंने यूरोप में पहली बार पृथ्वी को गोल और सूर्य को पृथ्वी से कई गुना बड़ा बताया और उन्होंने ही प्रथम मानचित्र बनाया।
एनेक्जिमेनीज- ये एनेक्जिमेंडर के शिष्य कहे जाते हैं। इनमें अपने गुरु जैसी न तो प्रति थी और न ही मौलिकता। इन्होंने वायु को परम तत्व माना और असीम तथा अनंत बताया। वायु ही अग्नि का रूप लेती है और तरल होकर जल बन जाती है। इससे गति और जीवन का संचार होता है। समस्त लोक वायु के आधार पर टिके हैं। माइलेशियन मत का महत्व उनके सिद्धान्तों की अपेक्षा उनके अन्वेषणात्मक प्रवृत्ति के कारण अधिक है। माइलेशियन मत का अध्ययन करके पाइथागोरस ने अपनी विचारधारा को एक नया आयाम प्रदान किया जिसमें विश्लेषण और रहस्यवादी साधना का समन्वय है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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