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किसी भी नगर या ग्राम में नए स्थान पर घर बनाने के कार्य का नाम वास्तु (गृहारंभ) है। इसे ही भवन की नींव कहा जाता है। इसी के आधार पर झोपड़ी से लेकर ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं का निर्माण होता है। इसी प्रारंभिक कार्य के विषय में जो कर्तव्य होते हैं उसे वास्तु विचार कहा जाता है। भविष्य पुराण में कहा गया है-
गृहस्थस्य क्रियास्सर्वा न सिद्धयन्ति गृहं बिना।
इसलिए सबसे पहले ग्राम में बसने के पूर्व शुभाशुभ फल का विचार कर लेना चाहिए। ग्राम या नगर में घर बनाने वाले पुरुष के पुकार या नाम राशि से जिस ग्राम या नगर की राशि 2, 9, 5, 11 या दसवीं हो, वह ग्राम या नगर उस व्यक्ति के लिए शुभ होता है। दूसरा विचार यह है कि व्यक्ति के अपने नाम के वर्ग को द्विगुणित करके उसमें ग्राम या नगर के वर्ग को जोड़कर उसमें 8 से भाग देने पर व्यक्ति की काकिणी होती है, एवं ग्राम के वर्ग को द्विगुणित कर उसमें व्यक्ति का वर्ग जोड़कर 8 से भाग देने पर ग्राम की काकिणी होती है। दोनों काकिणियों में जिसकी काकिणी अधिक हो वह अर्थद होता है। ग्राम की काकिणी से व्यक्ति की काकिणी अधिक होना शुभ है। मुहूर्त चिंतामणि में कहा गया है-
यद्भं द्वयङक सुतेशदिङ्मितमसौ ग्राम: शुभेनामभात्।
स्ववर्ग द्विगुणं विधाय पर वर्गाढ्यं गजै: शोषितम्।
काकिण्यस्त्यनयोश्च तद्विवरतो यस्याधिका: सोऽर्थद:।।
किन्तु ग्रंथान्तर में-
स्वर्ग द्विगुणं कृत्वा परवर्गे योजयेत्।
अष्टभिस्तु हरेद्भागं योऽधिक: स ऋणी भवेत्।।
इस वचन को मानते हैं परन्तु आर्ष (नारद, वशिष्ठ, कश्यप) मत से ‘यस्याधिका: सोऽर्थद:’ की पुष्टि होती है। अर्थात ग्राम से पुरुष की काकिणी अधिक होना ही शुभ है। काकिणी शब्द धन का पर्याय है। जिसके पास धन है वही सांसारिक सुखों का भोग करने वाला होता है। गृह विचार पुकार नाम से ही करना चाहिए, जन्म नाम से नहीं, क्योंकि कहा गया है-
काकिण्यां वर्गशुद्धौ च द्यूतेवादे गृहे तथा।
मंत्रे पुनर्भूवरणे नामराशे: प्रधानता।।
इसके बाद राशि के अनुसार गृह का विचार इस प्रकार किया जाता है- विप्र वर्ग (कर्क, वृश्चिक, मीन) राशि वालों को पूर्व में, वैश्य वर्ग (वृष, कन्या, मकर) राशि वालों को दक्षिण में, शूद्रवर्ण (मिथुन, तुला, कुंभ) राशि वालों को पश्चिम में और क्षत्रियवर्ण (मेष, सिंह, धनु) राशि वालों को उत्तर में गृह का द्वार बनाना चाहिए। जैसा कि ज्योतिषसार में कहा गया है-
पूर्वे ब्राह्मणराशीनां वैश्यानां दक्षिणे शुभम्।
शूद्राणां पश्चिमे द्वारं नृपाणामुत्तरे मतम्।।
इसके बाद वर्गानुसार ग्राम में वर्गेश की दिशाओं का भी विचार करना चाहिए-
वर्गा: खगेश मार्जार सिंहश्वसर्पमूषका:।
इभावी पूर्वतस्तेषां स्ववर्गात्पञ्चमोरिपु:।
तस्मात् स्ववैरि वर्गस्य दिशिवासो न शोभन:।।
अ वर्गादि आठ वर्गों के स्वामी क्रमश: गरुड़, मार्जार (बिल्ली), सिंह, कुत्ता, सर्प, मूषक, गज एवं मेष (भेड़) होते हैं। पूर्वादि दिशाओें के भी ये स्वामी होते हैं। अपने-अपने वर्ग से पांचवां शत्रु होता है। जैसे सर्प का गरुड़, मूषक का मार्जार, गज का सिंह व मेष का कुत्ता शत्रु होता है। इसलिए अपने शत्रु वर्ग की दिशा में बसना अच्छा नहीं होता है। जिस वर्ग में नाम का पहला अक्षर पड़े उसी में यदि ग्राम के नाम का पहला अक्षर भी पड़े तो वहां पर वास करना अच्छा है। किन्तु नाम वर्गेश से ग्राम वर्गेश शत्रु हो तो वहां कदापि वास नहीं करना चाहिए।
ब्राह्मणों को श्वेत व मधुर रस की मिट्टी से युक्त, क्षत्रियों को लाल, कटु रस से युक्त एवं शूद्र को काली, कषाय रस से युक्त मिट्टी वाली भूमि अच्छी होती है। अन्य के लिए श्वेतादि मिश्रित भूमि शुभ है। इसी प्रकार भूमि के ढाल पर शुभाशुभ फलों का विचार करना चाहिए। शल्यादि (हड्डी से युक्त) से युक्त भूमि पर कदापि वास नहीं करना चाहिए। दूषित भूमि के लक्षण इस प्रकार कहे गए हैं-
स्फुटिता च सशल्या च वल्मीकाऽऽरोहिणी तथा।
दूरत: परिवर्ज्येयं कर्तुरायुर्धनापहा।।
स्फुटिता मरणं कुर्य्यादूषरा धननाशिनी।
सशल्या क्लेशदा नित्यं विषमा शत्रुवर्धिनी।।
अर्थात जो भूमि फटी हुई हड्डी आदि से युक्त, दीमक लगी हुई और निम्नोन्नत (असमान) हो, ऐसी भूमि को त्याग देना चाहिए। फटी हुई भूमि में वास करने से मरण, ऊसर व दीमक वाली भूमि में वास करने से धननाश, हड्डी युक्त भूमि में वास करने से सर्वदा क्लेश व नीची-ऊंची जमीन में वास करने से शत्रु की वृद्धि होती है।
गजपृष्ठ भूमि लक्षण- जो भूमि दक्षिण, पश्चिम, नैर्ऋत्यकोण और वायव्यकोण की तरफ से ऊंची हो, वह गजपृष्ठ भूमि कहलाती है। उसमें वास करने से संपत्ति और आय में वृद्धि होती है।
कूर्मपृष्ठ भूमि लक्षण- जो भूमि बीच में ऊंची और चारो तरफ कछुए की पीठ के समान नीची हो, उसे कूर्मपृष्ठ भूमि कहते हैं। उसमें वास करने से दिन-प्रतिदिन उन्नति होती है। सुख और उत्साह वढ़ता है। पूर्व, उत्तर व ईशान में नीची हो तो और शुभ होता है।
दैत्यपृष्ठ भूमि लक्षण- जो भूमि पूर्व, अग्निकोण व ईशान कोण में ऊंची हो और दक्षिण दिशा में नीची हो, उसे दैत्यपृष्ठ भूमि कहते हैं। ऐसी भूमि में वास करने से धन, पुत्र, पशु की हानि होती है।
नागपृष्ठ भूमि लक्षण- जो भूमि पूर्व-पश्चिम में अधिक लम्बी और उत्तर-दक्षिण में ऊंची हो, वह नागपृष्ठ भूमि कहलाती है। इसमें वास करने से गृहकर्ता का उच्चाटन होता है एवं स्त्री, पुत्र की हानि व शत्रुओं में वृद्धि होती है।
आचार्य पवन कुमार राम त्रिपाठी

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  1. सार्थक पोस्ट जानकारी सहित आभार

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