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उद्देश्य की दृष्टि से विज्ञान नित्य है, इन्हीं के अनुसार ईश्वर इन्द्रिय जगत के पदार्थों का निर्माण करता है। विज्ञान वे पूर्ण आदर्श अर्थात मूल बिम्ब या रूप हैं जिनके प्रतिबिम्ब या प्रतिरूप इन्द्रिय जगत के पदार्थ हैं। सांसारिक पदार्थ इन आदेशों के अनुरूप होने का प्रयत्न करते हैं किन्तु वे पूर्ण सफल नहीं हो सकते। विश्व के समस्त पदार्थ अपूर्ण व अनित्य हैं। प्लेटो के अनुसार विश्व की सृष्टि इसलिए हुई है कि इसके अपूर्ण और अनित्य पदार्थ आदर्शों को प्राप्त करने के लिए उत्तरोत्तर विकसित हों। विश्व में विकास हो रहा है, यह यंत्रवत नहीं है, सोदेश्य है। विश्व में सामंजस्य है, समन्वय है, एकरूपता है और प्रत्येक पदार्थ भिन्न होते हुए भी इस अंतर्यासी अभेद को पाने के लिए प्रयत्नशील है। ईश्वर इस विश्व के निमित्त कारण हैं और विज्ञान इसका स्वरूप कारण है। नित्य विज्ञानों को प्राप्त करना हमारा उद्देश्य है। यह मानव का कर्तव्य है। आत्मा अमर और दिव्य है और नित्य विज्ञान उसका स्वरूप है। अत: स्वरूप लाभ करना दार्शनिक का लक्ष्य होना चाहिए। इन्द्रियों का दास होना उचित नहीं है। प्लेटो का इन्द्रिय जगत की निंदा का तात्पर्य इन्द्रिय जगत को असत सिद्ध करना न होकर इन्द्रिय जगत के ऊपर विज्ञान जगत को उठाना है। दुष्ट इन्द्रिया उस अड़ियल व बदमाश घोड़े की तरह हैं जो रथ को गर्त में लेकर पटक देता है और वहां से सरकने का नाम नहीं लेता है। साधु इन्द्रियां उस उत्तम घोड़े के समान हैं जो रथ को सन्मार्ग पर ले जाता है। फीड्रस में कहा गया है कि शरीर रूपी रथ में साधु और दुष्ट दोनों घोड़े जुते हुए हैं। एक विज्ञानों की ओर ले जाता है ओर दूसरा इन्द्रिय विषयों की ओर। आत्मा रूपी रथ का कर्तव्य दुष्ट घोड़े को रथ से निकाल लेना नहीं है, उसे साधु घोड़े के साथ-साथ चलाना है। प्लेटो इन्द्रिय जगत का नाश नहीं करना चाहते, वे उसकी प्रवृत्ति आत्माभिमुख करना चाहते हैं। नित्य विज्ञान भी जिसकी ज्योति में चमक है, जो ईश्वर का पिता है, जो समस्त विश्व में अंतर्यामी है, जो पर और अनिर्वचनीय है, जो सृष्टि का परम आदर्श है, जिसकी ओर जगत निरंतर विकसित हो रहा है, उस विशुद्ध विज्ञान स्वरूप परम सत्ता का निर्विकल्प साक्षात्कार ही मानव जीवन की चरम सार्थकता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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