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प्लेटो का शिवतत्व एक साथ सत्यं, शिवम व सुन्दरम तीनों है। यह विज्ञानों का भी विज्ञान है, स्वरूपों का भी स्वरूप है। यह समस्त विज्ञानों और समस्त सांसारिक पदार्थों का जनक है। यह विज्ञान जगत और इन्द्रिय जगत दोनों का अंतर्यामी अधिष्ठान है। यह समस्त सत्ता और ज्ञान का मूल स्रोत है। यह आत्मा को ज्ञान शक्ति और दृश्य जगत को सत्ता प्रदान करता है। यह ईश्वर से भी ऊपर है। ईश्वर केवल सगुण स्रष्टा है और विज्ञानों के मूलरूपों को आदर्श मानकर सृष्टि करता है। यह शिवतत्व ईश्वर और विज्ञान दोनों का कारण है। यह उनका भी प्राण है। प्लेटो ने ईश्वर को सृष्टि का निमित्त कारण और नियंता माना है। प्लेटो ने इस शिवतत्व के साक्षात्कार को रिपब्लिक और फिलेबस में भी बहुत सुन्दर रीति से बताया है। अनिर्वचनीय शिवतत्व का अधिक निर्वचन नहीं हो सकता। प्लेटो ने अपने शिष्यों को साक्षात संपर्क में आकर तत्व का का उपदेश दिया था। उसको उन्होंने प्रकाशित नहीं किया। चरम उपदेश तो मौन ही है। ज्ञान ही धर्म और अज्ञान अधर्म है। वास्तविक ज्ञानी कभी अधर्म नहीं कर सकता, क्योंकि धर्म ही उसका स्वरूप है। यह ज्ञान ही परम आनंद है। सांसारिक सुखों में उत्कर्षापकर्ष का तारतम्य है। इन्द्रिय सुख के ऊपर जाना भावना सुख है। भावना सुख के ऊपर बुद्धि सुख और बुद्धि सुख के ऊपर स्वानुभूति सुख है। अज्ञानी जन इन्द्रियों सुखों की ओर आकृष्ट होते हैं। ये इन्द्रिय सुख निरंतर बढ़ने वाले खाज के समान हैं जिन्हें खुजलाने मं सुख की भ्रान्ति होती है और वास्तव में दु:ख बढ़ता जाता है। रिपब्लिक में प्लेटो ने कहा है- ये लोग (विषय सुख के प्रेमी) निरे पशु के समान हैं। इनकी दृष्टि नीचे है, ये खाते-पीते और विषय सुख के प्रेमी हैं। विषय सुख के अत्यधिक प्रेम के कारण ये एक-दूसरे के प्राण ले लेते हैं। संसार में दु:खपूर्वक जीने वाला धार्मिक व्यक्ति, सुखपूर्वक जीने वाले अधार्मिक व्यक्ति से कई गुना बड़ा है, क्योंकि धार्मिक व्यक्ति को आत्म संतोष रूपी सर्वोत्तम सुख प्राप्त है। अपनी आत्मा को बेचकर संसार को खरीद लेने में कोई लाभ नहीं है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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