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परमतत्व विशुद्ध विज्ञान स्वरूप शिवतत्व है जो केवल अनुभूति का विषय है। सविकल्प तर्क द्वंद्वात्मक और निषेध प्रधान है। तर्क का कार्य अपने विकल्पों का खंडन करके निषेध रूप से यह सिद्ध करना है कि उसकी गति तत्व तक नहीं है। सविकल्प तर्क तत्व की ओर संकेत मात्र करके निर्विकल्प अनुभव की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। द्वंद्वात्मक तर्करूपी दर्शन ‘विज्ञानों का विज्ञान’ है। क्योंकि जहां अन्य विज्ञान समाप्त हो जाते हैं, वहां से इसका प्रारंभ होता है। जब दर्शन का तर्करूपी निषेधरूप समाप्त होता है तब निर्विकल्प अनुभव रूपी विधान स्वरूप प्रांरभ होता है। यह शिव तत्व की साधना है जो दर्शन का चरम लक्ष्य है। प्लेटो का सबसे अधिक महत्वपूर्ण सिद्धान्त उनका विज्ञानवाद है। यह सिद्धान्त अपने मूल रूप में सॉक्रेटीज का है। प्लेटो ने इसका विकास कर इसे विस्तृत रूप दिया है। प्लेटो के उत्कृष्ट साहित्यिक कला के कारण सॉक्रेटीज व उनके विचार घुलमिल गए हैं। पार्मेनाइटीज में प्लेटो ने सॉक्रेटीज के विज्ञानवाद का खंडन न करके उसका संशोधन किया है। सॉक्रेटीज के अनुसार इन्द्रिय जगत विज्ञान-जगत में भाग लेता है और उसको प्रतिबिम्बित करता है। परन्तु प्लेटो के अनुसार इन्द्रिय जगत वस्तुत: विज्ञान जगत का सत्य अंश है। ऐसा मानने पर व्यवहार और परमार्थ का भेद ही नहीं रहता और व्यवहार केवल अपूर्ण परमार्थ बन जाता है। यह प्लेटो को मान्य नहीं है और प्रतिबिम्ब मानने पर यह कह सकते हैं कि व्यवहार में कोई तत्व नहीं है। तब व्यवहार असत बन जाता है। यह भी प्लेटो को मान्य नहीं है। अत: प्लेटो इन्द्रिय जगत को विज्ञान जगत का अंश या प्रतिबिम्ब कहने की अपेक्षा उसे विज्ञान जगत की अभिव्यक्ति कहना अधिक अच्छा समझते हैं। यह प्लेटो का सॉक्रेटीज के मत में प्रथम संशोधन है। द्वितीय सॉक्रेटीज ने विज्ञान रूप शिवतत्व की ओर संकेत किया है। प्लेटो विज्ञानों को इस शिवतत्व के सूत्र में पिरोकर उसको अधिक स्पष्ट कर देना चाहते हैं। यह सत्य है क प्लेटो भी सॉक्रेटीज के समान शिव तत्व को अनिर्वचनीय और स्वानुभूतिगम्य मानते हैं और इसके विषय में अधिक नहीं कहते हैं, किन्तु इस शिव तत्व की अनिर्वचनीयता और प्राधान्य का उन्होंने स्पष्ट विवेचन किया है। तृतीय सॉक्रेटीज ने विज्ञानों के बहुत्व का इस शिव तत्व में स्पष्टतया विलय नहीं किया। प्लेटो ने स्पष्ट रूप से विज्ञानों को भी इस शिव तत्व की अभिव्यक्ति मात्र माना है। ये तीन महत्वपूर्ण संशोधन प्लेटो ने सॉक्रेटीज के विज्ञानवाद में किया है। प्लेटो के विज्ञानवाद का पांच दृष्टिकोण से विचार किया जाता है। प्रथम ज्ञान की दृष्टि से, द्वितीय स्वरूप की दृष्टि से, तृतीय उद्देश्य की दृष्टि से, चतुर्थ सत्ता की दृष्टि से और पंचम रहस्य की दृष्टि से।
acharya shardchandra mishra

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