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प्लेटो के अनुसार विज्ञान, ज्ञान का वास्तविक विषय है। ज्ञान और ज्ञान का विषय दोनों नित्य और अपरिणामी होने चाहिए। अनित्य व क्षणिक का वास्तविक ज्ञान नहीं हो सकता। गति, परिणाम, भेद ओर सापेक्षता का सदा अगतिशील, अपरिणामी, अद्वय और निरपेक्ष तत्व की ओर संकेत होता है जो इसका मूल अधिष्ठान है, जिनके बिना इनकी प्रतीति संभव नहीं है। इन्द्रिय जगत में अनित्यता और संदेह का साम्राज्य अवश्य है किन्तु यह इन्द्रिय जगत तक ही सीमित है। विज्ञान नित्य और असंदिग्ध है। विज्ञान स्वत: सिद्ध है। यदि विज्ञान का नित्यत्व और स्वत: सिद्धत्व स्वत: स्वीकार न किया जाय तो किसी प्रकार का ज्ञान संभव नहीं हो सकता। हमारे ज्ञान में जो सार्वभौमिकता और निश्चयात्मकता है वह इन्द्रिय जगत से न आकर विज्ञान जगत से आती है। विज्ञान की प्रतिष्ठा करने के कारण प्लेटो को वैज्ञानिक ज्ञान का प्रथम संस्थापक कहा जा सकता है। इन्द्रिय जगत में हमें केवल अनित्य संवेदन प्राप्त होते हैं जो हमारे मन के विषय कदापि नहीं बन सकते। विज्ञान ही ज्ञान का विषय बन सकता है। फीडो में कहा गया है कि इन्द्रियों से सत्य की प्राप्ति नहीं हो सकती है, सत्य की प्राप्ति ज्ञान से ही हो सकती है। किन्तु इसका अर्थ नहीं कि इन्द्रिय जगत हमारे ज्ञान के लिए सर्वथा आवश्यक है। प्लेटो ने फीडो में आगे चलकर कहा है कि इन्द्रियानुभव के बिना हमें विज्ञानों का स्मरण नहीं हो सकता है। स्वरूप की दृष्टि से विज्ञान सामान्य है। जगत के विविध विशेषों या व्यक्तियों की सत्ता सामान्यों के कारण ही है। सामान्य अपनी जाति के विशेषों में अनुगत रहते हैं। कार्य सजातीय विशेषों में एकरूपता लाना और उनका विजातीय विशेषों से भेद करना है। सामान्य अनेक विषयों में अनुगत एकता है। सामान्य भेद से विशिष्ट अभेद है। सामान्य उत्पत्ति, विनाश रहित, अपरिणामी व नित्य है। यह हमारी बुद्धि की कल्पना नहीं है। इनकी वास्तविक सत्ता है। विशेष इन सामान्यों का अनुसरण करते हैं किन्तु ठीक उन जैसे नहीं बन सकते हैं। संसार के सुन्दर कल्याणकारी पदार्थ सौन्दर्य और शिवत्व के अनुकरण मात्र हैं। सामान्य विज्ञान जगत में रहते हैं। इन्द्रिय जगत में इनकी क्षीण प्रतिकृतियां ही मिलती हैं। सामान्य विशेषों में अनुस्यूत रहता है। अत: यह कहा जाता है कि विशेष सामान्य में भाग लेते हैं। सामान्य दिव्य ज्ञान लोक में रहते हैं, जहां अमर आत्मा इनका साक्षात्कार करती है। जब आत्मा संसार में आकर शरीर में सीमित होती है तो इसे ये सामान्य याद आते हैं और यह स्मृति ही विज्ञान है जो विज्ञानों का प्रतिबिम्ब है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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  1. After having a dialogue with respected Pt Sharat Cahndra Mishra yesterday, I visited the web today for the first time and found it valuable. Definitely it would be a great effort to review western religions, science and philosophy from Indian point of view, with the similarities and dissimilarities therein. the site may be helpful to great extent for those who wish to understand the unsolved aspects of the other world.
    With best wishes
    Hari Shanker Rarhi

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